Tuesday, 21 November 2017

रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी Jhansi Rani Biography

रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी Jhansi Rani Biography

रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी Jhansi Rani Biography In Hindi

रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी Jhansi Rani Biography

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म - 19 नवम्बर 1828, वाराणसी, उत्तर प्रदेश

रानी लक्ष्मीबाई का स्वर्गवास - 18 जून 1858, कोटा की सराय, ग्वालियर

रानी लक्ष्मीबाई का जीवन सफर - Jhansi Rani Biography in hindi


रानी लक्ष्मीबाई मराठा शासित झाँसी राज्य की रानी और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना थीं। बलिदानों की धरती भारत में ऐसे-ऐसे वीरों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने रक्त से देश प्रेम की अमिट गाथाएं लिखीं। यहाँ की ललनाएं भी इस कार्य में कभी किसी से पीछे नहीं रहीं, उन्हीं में से एक का नाम है- झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई। उन्होंने न केवल भारत की बल्कि विश्व की महिलाओं को गौरवान्वित किया। उनका जीवन स्वयं में वीरोचित गुणों से भरपूर, अमर देशभक्ति और बलिदान की एक अनुपम गाथा है।

रानी लक्ष्मीबाई मराठा शासित झांसी की रानी और भारत की स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम वनिता थीं। भारत को दासता से मुक्त करने के लिए सन् 1857 में बहुत बड़ा प्रयास हुआ। यह प्रयास इतिहास में भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम या सिपाही स्वतंत्रता संग्राम कहलाता है।

अंग्रेज़ों के विरुद्ध रणयज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाले योद्धाओं में वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का नाम सर्वोपरी माना जाता है। 1857 में उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम का सूत्रपात किया था। अपने शौर्य से उन्होंने अंग्रेज़ों के दाँत खट्टे कर दिए थे।

अंग्रेज़ों की शक्ति का सामना करने के लिए उन्होंने नये सिरे से सेना का संगठन किया और सुदृढ़ मोर्चाबंदी करके अपने सैन्य कौशल का परिचय दिया था।

झाँसी का युद्ध:

उस समय भारत के बड़े भू-भाग पर अंग्रेज़ों का शासन था। वे झाँसी को अपने अधीन करना चाहते थे। उन्हें यह एक उपयुक्त अवसर लगा। उन्हें लगा रानी लक्ष्मीबाई स्त्री है और हमारा प्रतिरोध नहीं करेगी। उन्होंने रानी के दत्तक-पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और रानी को पत्र लिख भेजा कि चूँकि राजा का कोई पुत्र नहीं है, इसीलिए झाँसी पर अब अंग्रेज़ों का अधिकार होगा। रानी यह सुनकर क्रोध से भर उठीं एवं घोषणा की कि मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी। अंग्रेज़ तिलमिला उठे। परिणाम स्वरूप अंग्रेज़ों ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने भी युद्ध की पूरी तैयारी की। क़िले की प्राचीर पर तोपें रखवायीं। रानी ने अपने महल के सोने एवं चाँदी के सामान तोप के गोले बनाने के लिए दे दिया।

रानी के क़िले की प्राचीर पर जो तोपें थीं उनमें कड़क बिजली, भवानी शंकर, घनगर्जन एवं नालदार तोपें प्रमुख थीं। रानी के कुशल एवं विश्वसनीय तोपची थे गौस खाँ तथा ख़ुदा बक्श। रानी ने क़िले की मज़बूत क़िलाबन्दी की। रानी के कौशल को देखकर अंग्रेज़ सेनापति सर ह्यूरोज भी चकित रह गया। अंग्रेज़ों ने क़िले को घेर कर चारों ओर से आक्रमण किया।

अंग्रेज़ों की कूटनीति:

अंग्रेज़ आठ दिनों तक क़िले पर गोले बरसाते रहे परन्तु क़िला न जीत सके। रानी एवं उनकी प्रजा ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि अन्तिम सांस तक क़िले की रक्षा करेंगे। अंग्रेज़ सेनापति ह्यूराज ने अनुभव किया कि सैन्य-बल से क़िला जीतना सम्भव नहीं है। अत: उसने कूटनीति का प्रयोग किया और झाँसी के ही एक विश्वासघाती सरदार दूल्हा सिंह को मिला लिया जिसने क़िले का दक्षिणी द्वार खोल दिया। फिरंगी सेना क़िले में घुस गई और लूटपाट तथा हिंसा का पैशाचिक दृश्य उपस्थित कर दिया। घोड़े पर सवार, दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिए, पीठ पर पुत्र को बाँधे हुए रानी ने रणचण्डी का रूप धारण कर लिया और शत्रु दल संहार करने लगीं। झाँसी के वीर सैनिक भी शत्रुओं पर टूट पड़े। जय भवानी और हर-हर महादेव के उद्घोष से रणभूमि गूँज उठी। किन्तु झाँसी की सेना अंग्रेज़ों की तुलना में छोटी थी। रानी अंग्रेज़ों से घिर गयीं। कुछ विश्वासपात्रों की सलाह पर रानी कालपी की ओर बढ़ चलीं। दुर्भाग्य से एक गोली रानी के पैर में लगी और उनकी गति कुछ धीमी हुई। अंग्रेज़ सैनिक उनके समीप आ गए।

रानी लक्ष्मीबाई मृत्यु:

रानी को असहनीय वेदना हो रही थी परन्तु मुखमण्डल दिव्य कान्त से चमक रहा था। उन्होंने एक बार अपने पुत्र को देखा और फिर वे तेजस्वी नेत्र सदा के लिए बन्द हो गए। वह 17 जून, 1858 का दिन था, जब क्रान्ति की यह ज्योति अमर हो गयी। उसी कुटिया में उनकी चिता लगायी गई जिसे उनके पुत्र दामोदर राव ने मुखाग्नि दी। रानी का पार्थिव शरीर पंचमहाभूतों में विलीन हो गया और वे सदा के लिए अमर हो गयीं। इनकी मृत्यु ग्वालियर में हुई थी। विद्रोही सिपाहियों के सैनिक नेताओं में रानी सबसे श्रेष्ठ और बहादुर थी और उसकी मृत्यु से मध्य भारत में विद्रोह की रीढ़ टूट गई।

Monday, 20 November 2017

तुलसी के पत्ते खाने के अनगिनत फायदे

तुलसी के पत्ते खाने के अनगिनत फायदे

तुलसी के पत्ते खाने के अनगिनत फायदे 

तुलसी के पत्ते खाने के अनगिनत फायदे

तुलसी भारत में हिन्दुओं के लिए पूजनीय पौधा है, इसे अधिकतर हिन्दू परिवारों के घर के आंगन में देखा जा सकता है. हिन्दुओं में ऐसी मान्यता है कि तुलसी के पूजा करने से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है. तुलसी में कई औषधीय गुण पाए जाते हैं इसलिए इसका आयुर्वेदिक में महत्वपूर्ण स्थान है.


तुलसी के पत्ते में कई पोषक तत्व जैसे विटामिन ए, विटामिन सी, आयरन, कैल्शियम, मैगनीज और ओमेगा 3 मौजूद होते हैं. तुलसी में एंटीसेप्टिक और एंटीबैक्टीरियल के गुण पाए जाते हैं जो छोटे-मोटे बीमारी से तुरंत छुटकारा दिला देता है. ऐसे में तुलसी के पत्ते का रोज सुबह सेवन करने से आपकी स्वास्थ्य ठीक रहेगा. यहाँ हम रोज सुबह तुलसी के पत्ते खाने से होने वाले लाभ के बारे में बताने वाले हैं.

रोज सुबह तुलसी के पत्ते खाने से होते हैं ये अनगिनत फायदे


1.रोग प्रतिरोधक क्षमता बढती है -

रोज सुबह नहाने के बाद खाली पेट 3 से 5 तुलसी के पत्ते चबाकर खाने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढती है. जिसकी वजह से बार-बार होने वाली बुखार और कमजोरी से छुटकारा मिल जाएगा. आपको बता दें कि जब हमारे शरीर में रोगप्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है तभी बुखार जैसी कई बीमारी होती है.

2. मुंह की बदबू से छुटकारा -

रोज सुबह खाली पेट तुलसी के पत्ते खाने से मुंह से आने वाली की समस्या से निजात मिलता है. अगर आपको भी यह समस्या हैं तो जरुर तुलसी के पत्ते का सेवन करें.

3. सर्दी-जुकाम में राहत -

सर्दी और जुकाम होने पर तुलसी का पत्ता रामबाण साबित होता है. सर्दी-जुकाम होने पर तुलसी के पत्ते चबा-चबाकर खाना चाहिए या फिर चाय में तुलसी के पत्ते मिलाकर पीना चाहिए. ऐसे करने से कुछ ही मिनटों में इस बीमारी से राहत मिल जाता है.

इसके अलावा और भी कई फायदे हैं, जैसे - आँखों की रोशनी बढती है, मानसिक व शारीरिक तनाव दूर होता है, खांसी के लिए फायदेमंद है, सिर दर्द से निजात मिलता है और त्वचा संबंधी रोग समाप्त हो जाते हैं.
 प्रोटीन पाउडर बनाने का तरीका जानिए

प्रोटीन पाउडर बनाने का तरीका जानिए

 प्रोटीन पाउडर बनाने का तरीका जानिए 


 प्रोटीन पाउडर बनाने का तरीका जानिए

आजकल हर कोई युवा अपने शरीर को मजबूत बनाने के लिए जिम जाना पसंद करता है. केवल जिम जाने से ही बॉडी नहीं बनती बल्कि इसके अनुरूप खुराक भी लेना जरुरी होता है. जिम जाने वालों के लिए सबसे जरुरी है प्रोटीन आहार लेना तभी बॉडी बन पाएगा, अन्यथा आपके जिम जाने का कोई मतलब नहीं रहेगा.

वैसे तो मार्केट में प्रोटीन पाउडर उपलब्ध होते हैं, लेकिन इसके लिए कुछ ज्यादा ही जेब ढीला करना पड़ता है और कभी-कभी ये साइड इफ़ेक्ट भी कर देता है. अगर कम बजट में ही प्रोटीन पाउडर पाना चाहते हैं तो इसे आप खुद घर पर बना सकते है, जो फायदे ही फायदे रहेगा और किसी प्रकार का साइड इफेक्ट होने का खतरा नहीं रहेगा. यहाँ हम घर पर प्रोटीन पाउडर बनाने की विधि बताने वाले हैं.

घर पर प्रोटीन पाउडर बनाने का तरीका ghar par protein powder kaise banaye in hindi


आवश्यक सामग्री -
  1. घर पर प्रोटीन पाउडर बनाने के लिए हमें इन चीजों की जरुरत होगी,
  2. मिल्क पाउडर या चॉकलेट पाउडर - 200 ग्राम,
  3. सोयाबीन - 200 ग्राम,
  4. बादाम - 200 ग्राम,
  5. मूंगफली - 200 ग्राम

बनाने की विधि -

सबसे पहले सोयाबीन, बादाम और मूंगफली को धूप में रखकर सूखा दें और इन तीनों को एक साथ मिलाकर मिक्सर की सहायता से अच्छी तरह पीस लें. जब यह पाउडर की तरह पीसा जाए तब इसे किसी बर्तन में निकालकर रख दें और इसमें मिल्क पाउडर मिला दीजिये, मिल्क पाउडर न होने पर चॉकलेट पाउडर भी मिला सकते हैं. इस तरह प्रोटीन पाउडर तैयार हो जायेगा.

ऐसे करें इस्तेमाल -

तैयार किए गए इस प्रोटीन पाउडर का सेवन रोज सुबह खाली पेट एक गिलास दूध के साथ कर सकते हैं. जो लोग जिम जाते हैं वे दूध में 5 चम्मच प्रोटीन पाउडर मिला सकते हैं और जो जिम नहीं जाते वे इसे 3 चम्मच मिलाएं. ऐसा करने से आपको मजबूत शरीर मिलेगा तथा वजन भी बढेगा और इसके अलावा अन्य कई फायदे होंगे.
इस प्रकार हमारे द्वारा बताए गए प्रोटीन पाउडर बनाने का तरीका को अपनाएं और घर पर ही बनाये और दबदबा शरीर पाएं.

सरदार भगत सिंह का जीवन परिचय

सरदार भगत सिंह का जीवन परिचय

सरदार भगत सिंह का जीवन परिचय

सरदार भगत सिंह का जीवन परिचय Bagat Singh Biography In Hindi

सरदार भगतसिंह का नाम विश्व में 20वीं शताब्दी के अमर शहीदों में बहुत ऊँचा है। भगतसिंह ने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है। भगतसिंह अपने देश के लिये ही जीये और उसी के लिए शहीद भी हो गये।

क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में:

1919 में रॉलेक्ट एक्ट के विरोध में संपूर्ण भारत में प्रदर्शन हो रहे थे और इसी वर्ष 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग़ काण्ड हुआ । इस काण्ड का समाचार सुनकर भगतसिंह लाहौर से अमृतसर पहुँचे। देश पर मर-मिटने वाले शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि दी तथा रक्त से भीगी मिट्टी को उन्होंने एक बोतल में रख लिया, जिससे सदैव यह याद रहे कि उन्हें अपने देश और देशवासियों के अपमान का बदला लेना है ।

असेम्बली बमकाण्ड:

गंभीर विचार-विमर्श के पश्चात् 8 अप्रैल 1929 का दिन असेंबली में बम फेंकने के लिए तय हुआ और इस कार्य के लिए भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त निश्चित हुए। यद्यपि असेंबली के बहुत से सदस्य इस दमनकारी क़ानून के विरुद्ध थे तथापि वायसराय इसे अपने विशेषाधिकार से पास करना चाहता था। इसलिए यही तय हुआ कि जब वायसराय पब्लिक सेफ्टी बिल को क़ानून बनाने के लिए प्रस्तुत करे, ठीक उसी समय धमाका किया जाए और ऐसा ही किया भी गया। जैसे ही बिल संबंधी घोषणा की गई तभी भगत सिंह ने बम फेंका। इसके पश्चात् क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करने का दौर चला। भगत सिंह और बटुकेश्र्वर दत्त को आजीवन कारावास मिला।
भगत सिंह और उनके साथियों पर लाहौर षड़यंत्र का मुक़दमा भी जेल में रहते ही चला। भागे हुए क्रांतिकारियों में प्रमुख राजगुरु पूना से गिरफ़्तार करके लाए गए। अंत में अदालत ने वही फैसला दिया, जिसकी पहले से ही उम्मीद थी। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को मृत्युदंड की सज़ा मिली।

फाँसी की सज़ा:

23 मार्च 1931 की रात भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु देशभक्ति को अपराध कहकर फाँसी पर लटका दिए गए। यह भी माना जाता है कि मृत्युदंड के लिए 24 मार्च की सुबह ही तय थी, लेकिन जन रोष से डरी सरकार ने 23-24 मार्च की मध्यरात्रि ही इन वीरों की जीवनलीला समाप्त कर दी और रात के अंधेरे में ही सतलुज के किनारे उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया। लाहौर षड़यंत्र के मुक़दमे में भगतसिंह को फ़ाँसी की सज़ा मिली तथा 23 वर्ष 5 माह और 23 दिन की आयु में ही, 23 मार्च 1931 की रात में उन्होंने हँसते-हँसते संसार से विदा ले ली। भगतसिंह के उदय से न केवल अपने देश के स्वतंत्रता संघर्ष को गति मिली वरन् नवयुवकों के लिए भी प्रेरणा स्रोत सिद्ध हुआ। वे देश के समस्त शहीदों के सिरमौर थे। 24 मार्च को यह समाचार जब देशवासियों को मिला तो लोग वहाँ पहुँचे, जहाँ इन शहीदों की पवित्र राख और कुछ अस्थियाँ पड़ी थीं। देश के दीवाने उस राख को ही सिर पर लगाए उन अस्थियों को संभाले अंग्रेज़ी साम्राज्य को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेने लगे। देश और विदेश के प्रमुख नेताओं और पत्रों ने अंग्रेज़ी सरकार के इस काले कारनामे की तीव्र निंदा की।

Saturday, 18 November 2017

मंगल पांडे की जीवनी Mangal Pandey Biography

मंगल पांडे की जीवनी Mangal Pandey Biography

मंगल पांडे की जीवनी

मंगल पांडे का लोकप्रिय नारा -  मारो फ़िरंगी को!!!

मंगल पांडे का जन्म - 30 जनवरी 1831, नगवा गांव, बलिया जिला

मंगल पांडे का स्वर्गवास - 8 अप्रैल 1857, बैरकपुर, पश्चिम बंगाल

मंगल पांडे का जीवन सफर : मंगल पांडे की जीवनी


मंगल पांडे अथवा मंगल पान्डेय का नाम भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अग्रणी योद्धाओं के रूप में लिया जाता है, जिनके द्वारा भड़काई गई क्रांति की ज्वाला से अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन बुरी तरह हिल गया था। मंगल पांडे की शहादत ने भारत में पहली क्रांति के बीज बोए थे। ब्रह्मदेश (बर्मा {वर्तमान म्यांमार}) पर विजय तथा सिक्ख युद्ध की समाप्ति के पश्चात अंग्रेज़ों ने भारतवर्ष पर निष्कंटक राज्य करने के सपने देखें होंगे; पर उन्हें क्या पता था कि सन 1857 का वर्ष उनकी आशाओं पर तुषारपात का वर्ष सिद्ध होगा।

जंग-ए-आज़ादी:

भारतीय इतिहास में 29 मार्च, 1857 का दिन अंग्रेजों के लिए दुर्भाग्य के दिन के रूप में उदित हुआ। पाँचवी कंपनी की चौंतीसवीं रेजीमेंट का 1446 नं. का सिपाही वीरवर मंगल पांडे अंग्रेज़ों के लिए प्रलय-सूर्य के समान निकला। बैरकपुर की संचलन भूमि में प्रलयवीर मंगल पांडे का रणघोष गूँज उठा-

बंधुओ! उठो! उठो! तुम अब भी किस चिंता में निमग्न हो? उठो, तुम्हें अपने पावन धर्म की सौगंध! चलो, स्वातंत्र्य लक्ष्मी की पावन अर्चना हेतु इन अत्याचारी शत्रुओं पर तत्काल प्रहार करो।



मंगल पांडे के बदले हुए तेवर देखकर अंग्रेज़ सारजेंट मेजर ह्यूसन उसने पथ को अवरुद्ध करने के लिए आगे बढ़ा। उसने उस विद्रोही को उसकी उद्दंडता का पुरस्कार देना चाहा। अपनी कड़कती आवाज़ में उसने मंगल पांडे को खड़ा रहने का आदेश दिया। वीर मंगल पांडे के अरमान मचल उठे। वह शिवशंकर की भाँति सन्नद्ध होकर रक्तगंगा का आह्वान करने लगा। उसकी सबल बाहुओं ने बंदूक तान ली। उसकी सधी हुई उँगलियों ने बंदूक का घोड़ा अपनी ओर खींचा और घुड़ड़ घूँsss का तीव्र स्वर घहरा उठा। मेजर ह्यसन घायल कबूतर की भाँति भूमि पर तड़प रहा था। उसका रक्त भारत की धूल चाट रहा था। 1857 के क्रांतिकारी ने एक फिरंगी की बलि ले ली थी। विप्लव महायज्ञ के पुरोधा मंगल पांडे की बंदूक पहला स्वारा बोल चुकी थी। स्वातंत्र्य यज्ञ की वेदी को दस्यु-देह की समिधा अर्पित हो चुकी थी।

अंग्रेज़ी सेना द्वारा बंदी:

वीर मंगल पांडे ने अपने कर्तव्य की पूर्ति कर दी थी। शत्रु के रक्त से भारत भूमि का तर्पण किया था। मातृभूमि की स्वाधीनता जैसे महत कार्य के लिए अपनी रक्तांजलि देना भी अपना पावन कर्तव्य समझा। मंगल पांडे ने अपनी बंदूक अपनी छाती से अड़ाकर गोली छोड़ दी। गोली छाती में सीधी न जाती हुई पसली की तरफ फिसल गई और घायल मंगल पांडे अंग्रेज़ी सेना द्वारा बंदी बना लिये गये। अंगेज़ों ने भरसक प्रयत्न किया कि वे मंगल पांडे से क्रांति योजना के विषय में उसके साथियों के नाम-पते पूछ सकें; पर वह मंगल पांडे थे, जिनका मुँह अपने साथियों को फँसाने के लिए खुला ही नहीं।



कारतूस घटना:

1857 के विद्रोह का प्रारम्भ एक बंदूक की वजह से हुआ था। सिपाहियों को 1853 में एनफ़ील्ड बंदूक दी गयी थीं, जो कि 0.577 कैलीबर की बंदूक थी तथा पुरानी और कई दशकों से उपयोग में लायी जा रही ब्राउन बैस के मुकाबले में शक्तिशाली और अचूक थी। नयी बंदूक में गोली दागने की आधुनिक प्रणाली का प्रयोग किया गया था, परन्तु बंदूक में गोली भरने की प्रक्रिया पुरानी थी। नयी एनफ़ील्ड बंदूक भरने के लिये कारतूस को दांतों से काट कर खोलना पड़ता था और उसमे भरे हुए बारूद को बंदूक की नली में भर कर कारतूस में डालना पड़ता था। कारतूस का बाहरी आवरण में चर्बी होती थी, जो कि उसे नमी अर्थात पानी की सीलन से बचाती थी।

सिपाहियों के बीच अफ़वाह फ़ैल चुकी थी कि कारतूस में लगी हुई चर्बी सुअर और गाय के मांस से बनायी जाती है। यह हिन्दू और मुसलमान सिपाहियों दोनों की धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध था। अंग्रेज अफ़सरों ने इसे अफवाह बताया और सुझाव दिया कि सिपाही नये कारतूस बनायें, जिसमें बकरे या मधुमक्क्खी की चर्बी प्रयोग की जाये। इस सुझाव ने सिपाहियों के बीच फ़ैली इस अफवाह को और मज़बूत कर दिया। दूसरा सुझाव यह दिया गया कि सिपाही कारतूस को दांतों से काटने की बजाय हाथों से खोलें। परंतु सिपाहियों ने इसे ये कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि वे कभी भी नयी कवायद को भूल सकते हैं और दांतों से कारतूस को काट सकते हैं। तत्कालीन अंग्रेज अफ़सर प्रमुख (भारत) जार्ज एनसन ने अपने अफ़सरों की सलाह को दरकिनार हुए इस कवायद और नयी बंदूक से उत्पन्न हुई समस्या को सुलझाने से मना कर दिया।

29 मार्च सन् 1857 को नए कारतूस को प्रयोग करवाया गया, मंगल पांडे ने आज्ञा मानने से मना कर दिया और धोखे से धर्म को भ्रष्ट करने की कोशिश के ख़िलाफ़ उन्हें भला-बुरा कहा, इस पर अंग्रेज अफ़सर ने सेना को हुकम दिया कि उसे गिरफ्तार किया जाये, सेना ने हुक्म नहीं माना। पलटन के सार्जेंट हडसन स्वंय मंगल पांडे को पकड़ने आगे बढ़ा तो, पांडे ने उसे गोली मार दी, तब लेफ्टीनेंट बल आगे बढ़ा तो उसे भी पांडे ने गोली मार दी। घटनास्थल पर मौजूद अन्य अंग्रेज़ सिपाहियों नें मंगल पांडे को घायल कर पकड़ लिया। उन्होंने अपने अन्य साथियों से उनका साथ देने का आह्वान किया। किन्तु उन्होंने उनका साथ नहीं दिया। उन पर मुक़दमा (कोर्ट मार्शल) चलाकर 6 अप्रैल, 1857 को मौत की सज़ा सुना दी गई।

मंगल पांडे निधन:

फ़ौजी अदालत ने न्याय का नाटक रचा और फैसला सुना दिया गया। 8 अप्रैल का दिन मंगल पांडे की फाँसी के लिए निश्चित किया गया। बैरकपुर के जल्लादों ने मंगल पांडे के पवित्र ख़ून से अपने हाथ रँगने से इनकार कर दिया। तब कलकत्ता से चार जल्लाद बुलाए गए। 8 अप्रैल, 1857 के सूर्य ने उदित होकर मंगल पांडे के बलिदान का समाचार संसार में प्रसारित कर दिया। भारत के एक वीर पुत्र ने आज़ादी के यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी। वीर मंगल पांडे के पवित्र प्राण-हव्य को पाकर स्वातंत्र्य यज्ञ की लपटें भड़क उठीं। क्रांति की ये लपलपाती हुई लपटें फिरंगियों को लील जाने के लिए चारों ओर फैलने लगीं।

Wednesday, 15 November 2017

मूली खाने 10 के फायदे  Benefits of Radish

मूली खाने 10 के फायदे Benefits of Radish

प्रिय दोस्तों आज के इस लेख में हम आपको मूली खाने के अनेकों फायदें के बारे में बतायेंगें. दोस्तों मूल हमारे सेहत के लिए काफी फायदेमंद है लेकिन इसके प्रयोग करने के अगल-अलग तरीके है अगर मूली का प्रयोग सही तरीके से किया जाये तो ये किसी औषधी से कम नहीं है आइये जानते है मूली के फायदें
मूली खाने 10 के फायदे Benefits of Radish



मधुमेहः मूली खाने से या इसका रस पीने से मधुमेह में लाभ होता है.आधी मूली का रस दोपहर के समय मधुमेह (डायबिटीज) के रोगी को देने से लाभ होता है.

पीलिया (कामला, पाण्डु) : एक कच्ची मूली रोजाना सुबह सोकर उठने के बाद ही खाते रहने से कुछ ही दिनों में ही पीलिया रोग ठीक हो जाता है.

पेशाब के समय जलन व दर्दः आधा गिलास मूली के रस का सेवन करने से पेशाब के साथ होने वाली जलन और दर्द मिट जाता है.

पेशाब कम बननाः गुर्दे की खराबी से यदि पेशाब का बनना बंद हो जाए तो मूली का रस 50 मिलीलीटर रोजाना पीने से पेशाब फिर बनने लगता है.

पेट में दर्दः 1 कप मूली के रस में नमक और मिर्च डालकर सेवन करने से पेट साफ हो जाता है और पेट का दर्द भी दूर हो जाता है.

मूली का लगभग 1 ग्राम के चौथे भाग के रस में आवश्यकतानुसार नमक और 3-4 कालीमिर्च का चूर्ण डालकर 3-4 बार रोगी को पिलाने से पेट के दर्द में लाभ मिलता है.

हिचकीः मूली के कोमल पत्ते चबाकर रस चूसने से हिचकी तुरन्त बंद हो जाती है. मूली का रस हल्का-सा गर्म करके पीने से भी हिचकी बंद हो जाती है.

आंतों के रोगः मूली का रस आंतों में एण्टीसैप्टिक का कार्य करता हैं.

पथरीः 30 से 35 ग्राम मूली के बीजों को आधा लीटर पानी में उबाल लें. जब पानी आधा शेष रह जाए तब इसे छानकर पीएं. यह प्रयोग कुछ दिनों तक करने से मूत्राशय की पथरी चूर-चूर होकर पेशाब के साथ बाहर आ जाएगी. यह प्रयोग 2 से 3 महीने निरन्तर जारी रखें. मूली का रस पीने से पित्ताशय की पथरी बनना बंद हो जाती है.

बिच्छू के काटने परः मूली के टुकड़े पर नमक लगाकर बिच्छू के काटे स्थान पर रखने से दर्द शांत होता है. बिच्छू के काटे रोगी को मूली खिलाएं और पीड़ित स्थान पर भी मूली का रस लगाने से लाभ होता है.

Tuesday, 14 November 2017

रतन टाटा की जीवनी ratan tata biography

रतन टाटा की जीवनी ratan tata biography

रतन टाटा की जीवनी Ratan Tata Biography in Hindi

रतन टाटा की जीवनी Ratan Tata Biography in Hindi

रतन टाटा भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में से एक हैं। रतन टाटा हजारों लाखों लोगों के लिए आदर्श है इन्होंने अपने जीवन में कड़े संघर्ष मेहनत की बदौलत यह मुकाम हासिल किया है। रतन टाटा ने 1991 में टाटा ग्रुप के अध्यक्ष बने थे और 28 दिसंबर 2012 में रतन टाटा ने टाटा ग्रुप की अध्यक्षता से इस्तीफा दे दिया था। हालांकि रतन टाटा अभी भी टाटा ग्रुप के ट्रस्ट के अध्यक्ष बने हैं। रतन टाटा, टाटा ग्रुप के अलावा टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, टाटा पावर, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, टाटा टी, टाटा केमिकल्स, इंडियन होटल्स और टाटा टेलीसर्विसेज के अध्यक्ष भी रहे हैं। रतन टाटा ने अपनी अगुवाई में टाटा ग्रुप को नई बुलंदियों पर पहुंचाने का काम किया है।

रतन टाटा का शुरुआती जीवन –


रतन टाटा का जन्म 28 दिसंबर 1935 में सूरत शहर में हुआ था। 1940 के दशक में जब रतन टाटा के माता-पिता (सोनू और नवल) एक दूसरे से अलग हुए उस समय रतन टाटा 10 साल के और उनका छोटा भाई जिमी सिर्फ 7 साल का था। इसके बाद इन दोनों भाइयों का पालन पोषण इनकी दादी नवजबाई टाटा ने किया था। मुंबई के कैंपियन स्कूल से रतन टाटा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की उसके बाद कैथेड्रल एंड जॉन कॉनन से इन्होंने अपनी माध्यमिक शिक्षा पूरी की फिर इन्होंने स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग के साथ कॉर्नेल विश्वविद्यालय से 1962 में स्नातक की डिग्री ली। इन सबके बाद रतन टाटा ने हार्वर्ड बिजनेस स्कूल से 1975 में एडवांस मैनेजमेंट प्रोग्राम भी पूरा किया।

रतन टाटा का कैरियर –


भारत वापस आने से पहले रतन टाटा लॉस एंजिल्स, कैलिफोर्निया में जोन्स और एमोंस में थोड़े समय काम किया। रतन टाटा ने अपने करियर की शुरुआत टाटा ग्रुप से की थी, टाटा ग्रुप से रतन टाटा 1961 में जुड़े थे। रतन टाटा, टाटा ग्रुप की कई कंपनियों में अपना सहयोग दे चुके थे उसके बाद 1971 में इन्हें राष्ट्रीय रेडियो और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी (नेल्को) में प्रभारी निदेशक का कार्य भार सौंपा गया। इसके बाद 1981 में रतन टाटा, टाटा इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष बने। 1991 में जेआरडी टाटा ने अपने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने का फैसला लिया और रतन टाटा को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। रतन टाटा ने अपनी प्रतिभा के दम पर टाटा ग्रुप को नई बुलंदियों पर पहुंच दिया। रतन टाटा की अध्यक्षता में टाटा मोटर्स ने अपनी पहली भारतीय कार टाटा इंडिका लॉन्च की जो काफी सफल भी रही।<
इसके बाद टाटा टी ने टेटली, टाटा मोटर्स ने ‘जैगुआर लैंड रोवर’ और टाटा स्टील ने ‘कोरस’ को टेक ओवर कर भारतीय बाजार में तहलका मचा दिया। दुनिया की सबसे सस्ती कार बनाने का आईडिया भी रतन टाटा का ही था। हालाँकि बाद में इन्होंने 28 दिसंबर 2012 को टाटा समूह के सभी कार्यकारी जिम्मेदारियों से सेवानिवृत्त हो गए थे और उनकी जगह 44 वर्षीय साइरस मिस्त्री को दी गई। टाटा समूह से अपने कार्यों से निवृत होने वाले रतन टाटा ने हाल ही में ईकॉमर्स कंपनी स्नैपडील, अर्बन लैडर और चाइनीज़ मोबाइल कंपनी जिओमी में भी निवेश किया है। अभी रतन टाटा प्रधानमंत्री व्यापार और उद्योग परिषद और राष्ट्रीय विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता परिषद के अध्यक्ष के तौर पर नियुक्त हैं।
अब्राहम लिंकन की जीवनी Abraham Lincoln Biography

अब्राहम लिंकन की जीवनी Abraham Lincoln Biography

अब्राहम लिंकन की जीवनी Abraham Lincoln Biography

अब्राहम लिंकन की जीवनी Abraham Lincoln Biography
अमेरिका के 16 वाँ राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का जन्म 12 फरवरी, 1809 को केंटकी (अमेरिका) में हुआ था। उनका पूरा नाम अब्राहम थॉमस लिंकन था उनके पिता एक किसान थे। वह एक साल तक भी स्कूल नहीं गए लेकिन खुद ही पढ़ना लिखना सिखा और वकील बने। एक सफल वकील बनने से पहले उन्होंने विभिन्न प्रकार की नौकरियों की और धीरे – धीरे राजनीति की ओर मुड़े।
उस समय देश में गुलामी की प्रथा की समस्याओं चल रही थी। गोरे लोग दक्षिणी राज्यों के बड़े खेतों के स्वामी थे, और वह अफ्रीका से काले लोगो को अपने खेत में काम करने के लिए बुलाते थे और उन्हें दास के रूप में रखा जाता था। उत्तरी राज्यों के लोग गुलामी की इस प्रथा के खिलाफ थे और इसे समाप्त करना चाहते हैं अमेरिका का संविधान आदमी की समानता पर आधारित है। इस मुश्किल समय में, अब्राहम लिंकन 1860 में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे।


वह गुलामी की समस्या को हल करना चाहते थे। दक्षिणी राज्यों के लोग गुलामी के उन्मूलन के खिलाफ थे। इससे देश की एकता में खतरे आ सकता है। दक्षिणी राज्य एक नए देश बनाने की तैयार कर रहा था। परन्तु अब्राहम लिंकन चाहता था की सभी राज्यों एकजुट हो कर रहे। अब्राहम लिंकन को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। वह किसी भी कीमत पर देश की एकता की रक्षा करना चाहते थे।
अंत में उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के बीच एक नागरिक युद्ध छिड़ गया। उन्होंने युद्ध बहादुरी से लड़ा और घोषणा की, ‘एक राष्ट्र आधा दास और आधा बिना दास नहीं रह सकता” वह युद्ध जीत गए और देश एकजुट रहा। 4 मार्च 1865 को अब्राहम लिंकन इनका दुसरी बार शपथ समारोह हुआ। शपथ समारोह होने के बाद लिंकन इन्होंने किया हुआ भाषण बहुत मशहूर हुआ। उस भाषण से बहुत लोगो के आख मे आसु आ गये। वह किसी के भी खिलाफ नहीं थे और चाहते थे की सब लोग शांति से जीवन बिताये।


1862 में लिंकन की घोषणा की थी अब सभी दास मुक्त होगे।। इसी से ही लिंकन लोगो के बीच लोकप्रिय रहा। अपनी जिंदगी मे कई बार असफलताओ का सामना करने वाले अब्राहम लिंकन आख़िरकार अमेरिका के एक सफल राष्ट्रपति बने थे। वे संयुक्त राज्य अमेरिका के ऐसे महापुरुष थे, जिन्होंने देश और समाज की भलाई के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया। लिंकन कभी भी धर्म के बारे में चर्चा नहीं करते थे और किसी चर्च से सम्बद्ध नहीं थे। एक बार उनके किसी मित्र ने उनसे उनके धार्मिक विचार के बारे में पूछा।
लिंकन ने कहा – “बहुत पहले मैं इंडियाना में एक बूढ़े आदमी से मिला जो यह कहता था ‘जब मैं कुछ अच्छा करता हूँ तो अच्छा अनुभव करता हूँ और जब बुरा करता हूँ तो बुरा अनुभव करता हूँ’। यही मेरा धर्म है”।

अब्राहम लिंकन की मृत्यु -


14 अप्रैल 1865 को वॉशिंग्टन के एक नाट्यशाला मे नाटक देख रहे थे तभी ज़ॉन विल्किज बुथ नाम के युवक ने उनको गोली मारी। इस घटना के बाद दुसरे दिन मतलब 15 अप्रैल के सुबह अब्राहम लिंकन की मौत हुयी।
एक बार लिंकन और उनके एक सहयोगी वकील ने एक बार किसी मानसिक रोगी महिला की जमीन पर कब्जा करने वाले एक धूर्त आदमी को अदालत से सजा दिलवाई। मामला अदालत में केवल पंद्रह मिनट ही चला। सहयोगी वकील ने जीतने के बाद फीस में बँटवारकन ने उसे डपट दिया। सहयोगी वकील ने कहा कि उस महिला के भाई ने पूरी फीस चुका दी थी और सभी अदालत के निर्णय से प्रसन्न थे परन्तु लिंकन ने कहा – “लेकिन मैं खुश नहीं हूँ। वह पैसा एक बेचारी रोगी महिला का है और मैं ऐसा पैसा लेने के बजाय भूखे मरना पसंद करूँगा। तुम मेरी फीस की रकम उसे वापस कर दो।”
मदर टेरेसा की जीवनी Mother Teresa Biography

मदर टेरेसा की जीवनी Mother Teresa Biography

मदर टेरेसा की जीवनी Mother Teresa Biography

मदर टेरेसा की जीवनी Mother Teresa Biography

तमाम जीवन परोपकार और दूसरों की सेवा में अर्पित करने वाली मदर टेरेसा ऐसे महान लोगों में से एक हैं जो सिर्फ दूसरों के लिए जीती थीं। संसार के तमाम दीन-दरिद्र, बीमार, असहाय और गरीबों के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित करने वाली मदर टेरेसा का असली नाम ‘अगनेस गोंझा बोयाजिजू’था।

मदर टेरेसा का जन्म -


अलबेनियन भाषा में गोंझा का अर्थ फूल की कली होता है। मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त, 1910 को स्कॉप्जे (अब मसेदोनिया में) में एक अल्बेनीयाई परिवार में हुआ। उनके पिता निकोला बोयाजू एक साधारण व्यवसायी थे।

मदर टेरेसा के पिता का निधन -

जब वह मात्र आठ साल की थीं तभी उनके पिता परलोक सिधार गए, जिसके बाद उनके लालन-पालन की सारी जिम्मेदारी उनकी माता द्राना बोयाजू के ऊपर आ गयी। वह पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं।
समाजसेवी मदर टेरेसा -
18 साल की उम्र में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ़ लोरेटो’ में शामिल होने का फैसला लिया और फिर वह आयरलैंड चली गयीं जहाँ उन्होंने अंग्रेजी भाषा सीखी क्योंकि ‘लोरेटो’की सिस्टर्स के लिए ये जरुरी था। आयरलैंड से 6 जनवरी, 1929 को वह कोलकाता में ‘लोरेटो कॉन्वेंट पंहुचीं। 1944 में वह सेंट मैरी स्कूल की प्रधानाचार्या बन गईं।

एक कैथोलिक नन -


मदर टेरसा रोमन कैथोलिक नन थीं। मदर टेरेसा ने ‘निर्मल हृदय’ और ‘निर्मला शिशु भवन’के नाम से आश्रम खोले, जिनमें वे असाध्य बीमारी से पीड़ित रोगियों व ग़रीबों की स्वयं सेवा करती थीं। 1946 में गरीबों, असहायों, बीमारों और लाचारों के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। 1948 में स्वेच्छा से उन्होंने भारतीय नागरिकता ले ली थी।

मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी की स्थापना -

7 अक्टूबर 1950 को उन्हें वैटिकन से ‘मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी’की स्थापना की अनुमति मिल गयी। इस संस्था का उद्देश्य समाज से बेखर और बीमार गरीब लोगों की सहायता करना था। मदर टेरेसा को उनकी सेवाओं के लिए विविध पुरस्कारों एवं सम्मानों से सम्मनित किया गया था।

पद्मश्री से सम्मनित -

भारत सरकार ने उन्हें 1962 में पद्मश्री से सम्मनित किया। इन्हें 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार और 1980 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया। मदर टेरेसा ने नोबेल पुरस्कार की 192,000 डॉलर की धन-राशि गरीबों को फंड कर दी। 1985 में अमेरिका ने उन्हें मेडल आफ़ फ्रीडम से नवाजा।

अंतिम समय में रहीं परेशान -

अपने जीवन के अंतिम समय में मदर टेरेसा ने शारीरिक कष्ट के साथ-साथ मानसिक कष्ट भी झेले क्योंकि उनके ऊपर कई तरह के आरोप लगाए गए थे। उन पर ग़रीबों की सेवा करने के बदले उनका धर्म बदलवाकर ईसाई बनाने का आरोप लगा। भारत में भी पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में उनकी निंदा हुई। उन्हें ईसाई धर्म का प्रचारक माना जाता था।

मदर टेरेसा का निधन -



मदर टेरेसा की बढती उम्र के साथ-साथ उनका स्वास्थ्य भी गिरता चला गया। 1983 में पॉप जॉन पॉल द्वितीय से मिलने के दौरान उन्हें पहली बार दिल का दौरा पड़ा। 1989 में उन्हें दूसरा दिल का दौरा पड़ा और उन्हें कृत्रिम पेसमेकर लगाया गया।
उनका निधन -
उनका निधन साल 1991 में मैक्सिको में उन्हें न्यूमोनिया और ह्रदय की परेशानी हो गयी। 13 मार्च 1997 को उन्होंने ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ के मुखिया का पद छोड़ दिया और 5 सितम्बर, 1997 को उनकी मौत हो गई।
मिल्खा सिंह की जीवनी Milkha Singh Biography

मिल्खा सिंह की जीवनी Milkha Singh Biography

मिल्खा सिंह की जीवनी : Milkha Singh Biography In Hindi


मिल्खा सिंह की जीवनी Milkha Singh Biography In Hindi

मिल्खा सिंह का जन्म पाकिस्तान के लायलपुर में 8 अक्टूबर, 1935 को हुआ था। उन्होंने अपने माता-पिता को भारत-पाक विभाजन के समय हुए दंगों में खो दिया था। वह भारत उस ट्रेन से आए थे जो पाकिस्तान का बॉर्डर पार करके शरणार्थियों को भारत लाई थी। अत: परिवार के नाम पर उनकी सहायता के लिए उनके बड़े भाई-बहन थे। मिल्खा सिंह का नाम सुर्ख़ियों में तब आया जब उन्होंने कटक में हुए राष्ट्रीय खेलों में 200 तथा 400 मीटर में रिकॉर्ड तोड़ दिए।

1958 में ही उन्होंने टोकियो में हुए एशियाई खेलों में 200 तथा 400 मीटर में एशियाई रिकॉर्ड तोड़ते हुए स्वर्ण पदक जीते। इसी वर्ष अर्थात 1958 में कार्डिफ (ब्रिटेन) में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भी स्वर्ण पदक जीता। उनकी इन्हीं सफलताओं के कारण 1958 में भारत सरकार द्वारा उन्हें ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया। मिल्खा सिंह का नाम ‘फ़्लाइंग सिख’ पड़ने का भी एक कारण था। वह तब लाहौर में भारत-पाक प्रतियोगीता में दौड़ रहे थे। वह एशिया के प्रतिष्ठित धावक पाकिस्तान के अब्दुल खालिक को 200 मीटर में पछाड़ते हुए तेज़ी से आगे निकल गए, तब लोगों ने कहा- ”मिल्खा सिंह दौड़ नहीं रहे थे, उड़ रहे थे।” बस उनका नाम ‘फ़्लाइंग सिख’ पड़ गया।

मिल्खा सिंह के बारे में




मिल्खा सिंह ने अनेक बार अपनी खेल योग्यता सिद्ध की। उन्होंने 1968 के रोम ओलंपिक में 400 मीटर दौड़ में ओलंपिक रिकॉर्ड तोड़ दिया। उन्होंने ओलंपिक के पिछले 59 सेकंड का रिकॉर्ड तोड़ते हुए दौड़ पूरी की। उनकी इस उपलब्धि को पंजाब में परी-कथा की भांति याद किया जाता है और यह पंजाब की समृद्ध विरासत का हिस्सा बन चुकी है। इस वक्त अनेक ओलंपिक खिलाड़ियों ने रिकॉर्ड तोड़ा था। उनके साथ विश्व के श्रेष्ठतम एथलीट हिस्सा ले रहे थे। 1960 में रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर दौड़ की प्रथम हीट में द्वितीय स्थान (47.6 सेकंड) पाया था। 

फिर सेमी फाइनल में 45.90 सेकंड का समय निकालकर अमेरिकी खिलाड़ी को हराकर द्वितीय स्थान पाया था। फाइनल में वह सबसे आगे दौड़ रहे थे। उन्होंने देखा कि सभी खिलाड़ी काफी पीछे हैं अत: उन्होंने अपनी गति थोड़ी धीमी कर दी। परन्तु दूसरे खिलाड़ी गति बढ़ाते हुए उनसे आगे निकल गए। अब उन्होंने पूरा जोर लगाया, परन्तु उन खिलाड़ियों से आगे नहीं निकल सके। अमेरिकी खिलाड़ी ओटिस डेविस और कॉफमैन ने 44.8 सेकंड का समय निकाल कर प्रथम व द्वितीय स्थान प्राप्त किया। दक्षिण अफ्रीका के मैल स्पेन्स ने 45.4 सेकंड में दौड़ पूरी कर तृतीय स्थान प्राप्त किया। मिल्खा सिंह ने 45.6 सेकंड का समय निकाल कर मात्र 0.1 सेकंड से कांस्य पदक पाने का मौका खो दिया।


मिल्खा सिंह को बाद में अहसास हुआ कि गति को शुरू में कम करना घातक सिद्ध हुआ। विश्व के महान एथलीटों के साथ प्रतिस्पर्धा में वह पदक पाने से चूक गए। मिल्खा सिंह ने खेलों में उस समय सफलता प्राप्त की जब खिलाड़ियों के लिए कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं, न ही उनके लिए किसी ट्रेनिंग की व्यवस्था थी। आज इतने वर्षों बाद भी कोई एथलीट ओलंपिक में पदक पाने में कामयाब नहीं हो सका है। रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह इतने लोकप्रिय हो गए थे कि जब वह स्टेडियम में घुसते थे, दर्शक उनका जोशपूर्वक स्वागत करते थे। 

यद्यपि वहाँ वह टॉप के खिलाड़ी नहीं थे, परन्तु सर्वश्रेष्ठ धावकों में उनका नाम अवश्य था। उनकी लोकप्रियता का दूसरा कारण उनकी बढ़ी हुई दाढ़ी व लंबे बाल थे। लोग उस वक्त सिख धर्म के बारे में अधिक नहीं जानते थे। अत: लोगों को लगता था कि कोई साधु इतनी अच्छी दौड़ लगा रहा है। उस वक्त ‘पटखा’ का चलन भी नहीं था, अत: सिख सिर पर रूमाल बाँध लेते थे। मिल्खा सिंह की लोकप्रियता का एक अन्य कारण यह था कि रोम पहुंचने के पूर्व वह यूरोप के टूर में अनेक बड़े खिलाडियों को हरा चुके थे और उनके रोम पहुँचने के पूर्व उनकी लोकप्रियता की चर्चा वहाँ पहुंच चुकी थी।


मिल्खा सिंह के जीवन में दो घटनाए बहुत महत्व रखती हैं। प्रथम-भारत-पाक विभाजन की घटना जिसमें उनके माता-पिता का कत्ल हो गया तथा अन्य रिश्तेदारों को भी खोना पड़ा। दूसरी-रोम ओलंपिक की घटना, जिसमें वह पदक पाने से चूक गए। इसी प्रथम घटना के कारण जब मिल्खा सिंह को पाकिस्तान में दौड़ प्रतियोगिता में भाग लेने का आमंत्रण मिल्खा तो वह विशेष उत्साहित नहीं हुए। लेकिन उन्हें एशिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के साथ दौड़ने के लिए मनाया गया।

 उस वक्त पाकिस्तान का सर्वश्रेष्ठ धावक अब्दुल खादिक था जो अनेक एशियाई प्रतियोगिताओं में 200 मीटर की दौड़ जीत चुका था। ज्यों ही 200 मीटर की दौड़ शुरू हुई यूं लगा कि मानो मिल्खा सिंह दौड़ नहीं, उड़ रहें हों। उन्होंने अब्दुल खादिक को बहुत पीछे छोड़ दिया। लोग उनकी दौड़ को आश्चर्यचकित होकर देख रहे थे। तभी यह घोषणा की गई कि मिल्खा सिंह दौड़ने के स्थान पर उड़ रहे थे और मिल्खा सिंह को ‘फ़्लाइंग सिख’ कहा जाने लगा। उस दौड़ के वक्त पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अय्यूब भी मौजूद थे।

 इस दौड़ में जीत के पश्चात् मिल्खा सिंह को राष्ट्रपति से मिलने के लिए वि.आई.पी. गैलरी में ले जाया गया। मिल्खा सिंह द्वारा जीती गई ट्राफियां, पदक, उनके जूते (जिन्हें पहन कर उन्होंने विश्व रिकार्ड तोड़ा था), ब्लेजर यूनीफार्म उन्होंने जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में बने राष्ट्रीय खेल संग्रहालय को दान में दे दिए थे। 1962 में एशियाई खेलों में मिल्खा सिंह ने स्वर्ण पदक जीता। खेलों से रिटायरमेंट के पश्चात् वह इस समय पंजाब में खेल, युवा तथा शिक्षा विभाग में अतिरिक्त खेल निदेशक के पद पर कार्यरत हैं।


उनका विवाह पूर्व अन्तरराष्ट्रीय खिलाड़ी निर्मल से हुआ था। मिल्खा सिंह के एक पुत्र तथा तीन पुत्रियां है। उनका पुत्र चिरंजीव मिल्खा सिंह (जीव मिल्खा सिंह भी कहा जाता है) भारत के टॉप गोल्फ खिलाड़ियों में से एक है तथा राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेकों पुरस्कार जीत चुका है। उसने 1990 में बीजिंग के एशियाई खेलों में भी भाग लिया था। मिल्खा सिंह की तीव्र इच्छा है कि कोई भारतीय एथलीट ओलंपिक पदक जीते, जो पदक वह अपनी छोटी-सी गलती के कारण जीतने से चूक गए थे।


 मिल्खा सिंह चाहते हैं कि वह अपने पद से रिटायर होने के पश्चात् एक एथलेटिक अकादमी चंडीगढ़ या आसपास खोलें ताकि वह देश के लिए श्रेष्ठ एथलीट तैयार कर सकें। मिल्खा सिंह अपनी लौह इच्छा शक्ति के दम पर ही उस स्थान पर पहुँच सके, जहाँ आज कोई भी खिलाड़ी बिना औपचारिक ट्रेनिंग के नहीं पहुँच सका।

उपलब्धियां -

  • 1957 में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर में 47.5 सेकंड का नया रिकॉर्ड बनाया।
  • टोकियो जापान में हुए तीसरे एशियाड (1958) में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर तथा 200 मीटर में दो नए रिकॉर्ड स्थापित किए।
  • जकार्ता (इंडोनेशिया) में हुए चौथे एशियाड (1959) में उन्होंने 400 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीता।
  • 1959 में भारत सरकार ने उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया।
  • 1960 में रोम ओलंपिक में उन्होंने 400 मीटर दौड़ का रिकॉर्ड तोड़ा।
  • 1962 के एशियाई खेलों में मिल्खा सिंह ने स्वर्ण पदक जीता।
विक्की रॉय की जीवनी Vicky Roy Biography In Hindi

विक्की रॉय की जीवनी Vicky Roy Biography In Hindi

विक्की रॉय की जीवनी : Vicky Roy Biography In Hindi

विक्की रॉय की जीवनी

क्या हम सोच सकते है कि गरीबी के कारण 11 वर्ष की उम्र में घर से भागने वाला लड़का जो दिल्ली जाकर रेलवे स्टेशन पर जाकर कचरा बीनने लगा वह एक अन्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फोटोग्राफर बन सकता है? पढ़िए हजारों लोगो के प्रेरणास्त्रोत 27 वर्षीय मशहूर फोटोग्राफर विक्की रॉय की गरीबी, संघर्ष और सफलता की कहानी।

विक्की रॉय 11 वर्ष की उम्र में घर से भागना –


पुरुलिया गांव (पश्चिम बंगाल) में बहुत ही गरीब परिवार में जन्मे विक्की रॉय (Vicky Roy) जब छोटे थे तो उनके माता पिता ने गरीबी के कारण विक्की को उनके नाना-नानी के घर छोड़ दिया था। नाना नानी के घर में विक्की के साथ अत्याचार होता था। वहां पर विकी को दिन भर काम करना पड़ता और छोटी-छोटी बातों के लिए उनके साथ मार-पीट होती थी। नाना-नानी के घर में विकी एक कैदी के समान हो गए थे जबकि विक्की को घुमने फिरने शौक था। इसलिए 1999 में मात्रा 11 वर्ष की आयु में विक्की ने अपने मामा की जेब से 900 रूपये चोरी किये और घर से भाग गए। घर छोड़ने के बाद विक्की दिल्ली पहुँच गए।
विक्की जब छोटे से गाँव से भागकर दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचे तो शहर की भीड़भाड़ देखकर वे घबरा गए और रोने लगे। तभी उनकी मुलाकात रेलवे स्टेशन पर रहने वाले कुछ लड़कों से हुयी जो वहां पर कचरा बीनने का काम करते थे। विक्की दिन भर उन लड़कों के साथ रहते और रेलवे स्टेशन से खाली बोतलें बीनकर, उसमें पानी भर कर रेल के जनरल डब्बों में बेचते। रात को वे रेलवे स्टेशन पर सोते थे लेकिन रात में जब पुलिस वाले मुआइना करने के लिए आते तो डंडा मारकर भगा देते थे। कुछ दिनों बाद कुछ व्यक्ति, विक्की को अनाथालय (शेल्टर होम) गए। विक्की अनाथालय में रहने लगे और वहां पर उन्हें अच्छा खाना-पीना मिल जाता था।

लेकिन शेल्टर होम पर हमेशा ताला लगा रहता था और कोई भी वहां से बाहर नहीं जा सकता था। विक्की फिर से एक कैदी की तरह हो गए थे, इसलिए उन्होंने अनाथालय से भागने का फैसला किया। एक दिन मौका देखकर वह अनाथालय से भाग गए और फिर से रेलवे स्टेशन जाकर वही कचरा बीनने का काम करने लगे। लेकिन पैसों की कमी के कारण कुछ महीनों बाद वह अजमेरी गेट के किसी सड़क किनारे बने रेस्तरां में, बर्तन धोने का काम करने लगे। यह समय विक्की के लिए सबसे मुश्किल समय था। कड़ाके की ठण्ड में विक्की को सुबह पांच बजे उठा दिया जाता और वे रात को 12 बजे तक ठन्डे पानी से बर्तन धोते।

              
एक बार उसी रेस्तरां में एक सज्जन व्यक्ति खाना खाने आये। उन्होंने जब विक्की को काम करते देखा, तो उन्होंने कहा कि तुम्हारी पढने-लिखने की उम्र है, पैसे कमाने की नहीं और वे विक्की को सलाम बालक ट्रस्ट नामक संस्था में ले आए। सलाम बालक ट्रस्ट की “अपना घर” संस्था में विक्की रहने लग गए। 2000 में, उनका दाखिल 6th क्लास में करा दिया गया और वे निरंतर रूप से स्कूल जाने लगे। लेकिन 10 th क्लास में उनके, मात्रा 48 % ही आये, इस कारण उन्होंने कुछ और करने का निर्णय लिया।

   ➤ BEGINNING AS A PHOTOGRAPHER                                

2004 में विक्की ने अपने टीचर को फोटोग्राफी क्षेत्र में अपनी रूचि के बारे में बताया। उसी समय ट्रस्ट के अंदर ही एक फोटोग्राफी वर्कशॉप का आयोजन हो रहा था, जिसके लिए ब्रिटिश फोटोग्राफर डिक्सी बेंजामिन आये हुए थे। तो टीचर ने डिक्सी बेंजामिन से विक्की का परिचय करवाया और कहा कि यह एक फोटोग्राफर बनना चाहता है। डिक्सी ने विक्की को थोड़ी-बहुत फोटोग्राफी सिखाई, लेकिन विक्की को उनके साथ काम करने में परेशानी हुई, क्योकि विक्की को इंग्लिश नहीं आती थी। कुछ ही समय बाद डिक्सी वापस विदेश लौट गए। इसके बाद विक्की को दिल्ली के एक फोटोग्राफर, एनी मान से सीखने का मौका मिला। एनी उन्हें 3000 रुपये, तनख़्वाह के रूप में और मोबाइल और बाइक के लिए पैसे देते थे। 18 साल की उम्र तक तो विक्की सलाम बालक ट्रस्ट में रहें, लेकिन इसके बाद उन्हें किराये पर मकान लेकर रहना पड़ा। इसी समय उन्होंने सलाम बालक ट्रस्ट से, B/W Nikon camera खरीदने के लिए लोन लिया। इसके लिए उन्हें हर महीने, Rs 500 किस्त के रूप में और Rs 2,500 मकान का किराया भी देना होता था। इस कारण विक्की को बड़े-बड़े होटलों में वेटर का काम करना पड़ता था, जिससे उन्होंने रोजाना Rs 250 मिल जाते थे।


   ➤RAG-PICKER TURNED PHOTOGRAPHER                      

2007 में जब विक्की 20 वर्ष के हो गए तो उन्होंने अपनी फोटोग्राफी की पहली प्रदर्शनी लगाई। इसका नाम था ‘Street Dreams’ और उन्होंने यह प्रदर्शनी India Habitat centre में लगाई। इससे उन्हें बहुत ख्याति मिली। इसके बाद में वे लंदन, वियतनाम और दक्षिण अफ्रीका भी गए। 2008 में विक्की तीन अन्य फोटोग्राफर के साथ राम चंद्र नाथ फाउंडेशन द्वारा नामित, मायबच फाउंडेशन के लिए फोटोग्राफी करने न्यूयॉर्क भी गए। 2009 की शुरुआत में छह महीने के लिए, विक्की ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के पुनर्निर्माण की फोटोग्राफी का अध्ययन किया। वापस भारत आने के बाद, विक्की को सलाम बालक ट्रस्ट ने International Award for Young people सम्मानित किया।

  ➤SUCCESS & AWARDS                                                             

इसके बाद विक्की को और भी कई सम्मान से नवाज़ गया। 2010 में, विक्की को Bahrain Indian ladies association ने young achiever from India से भी सम्मानित किया। 2011 में विक्की और उनके दोस्त Chandan Gomes ने फोटोग्राफी लाइब्रेरी बनाई और कई अन्य प्रसिद्ध फोटोग्राफर से भी इससे जुड़ने आग्रह किया, ताकि जो लोग पैसों की तंगी की वजह से फोटोग्राफी सम्बंधित किताबें नहीं खरीद नहीं पाते, उनकी सहायता की जा सकें। अब इस लाइब्रेरी में 500 किताबें है और विक्की समय-समय पर वर्कशॉप भी करवाते हैं। 2013 में विक्की का चयन आठ अन्य फोटोग्राफर के साथ Nat Geo Mission के Cover shoot के लिए हुआ और वो श्रीलंका गए। इसी साल उन्होंने अपनी पहली किताब ‘Home Street Home’ लिखी, जिसे Nazar Foundation ने प्रकाशित किया। इसका दूसरा भाग, 2013 में ही Delhi Photo Festival में प्रकाशित हुआ। इन्हें 2014 में, Boston MIT और Ink Talk में एक महीनें के लिए fellowship भी मिली। कई सालों के बाद विक्की अपने भाई- बहनों से भी मिले। अब वह अपने परिवार की देखरेख भी करते हैं। अब वह freelance photographer के रूप में काम करते हैं।


विक्की बताते हैं –अगर आप अपने जीवन में कुछ करना चाहते हैं तो आपको हमेशा कड़ी मेहनत करनी होगी, सफल होने के लिए कोई भी शोर्टकट नहीं होता। अगर आप अपने सपनों को साकार करना चाहते हैं तो उसी पर अपनी नज़र रखें। बाधाओं से डर कर भागने से, आप कभी सफल नहीं हो पाएंगे।
अमिताभ बच्चन की जीवनी Amitabh Bachchan Biography

अमिताभ बच्चन की जीवनी Amitabh Bachchan Biography

अमिताभ बच्चन की जीवनी : Amitabh Bachchan Biography in Hindi

हिंदी फिल्म जगत के शहंशाह अमिताभ बच्चन भारत के सबसे सफल, लोकप्रियता तथा ज्यादा समय तक ‘सुपर स्टार’ (अब ‘मेगास्टार’) रहने का गौरव पाने वाले अभिनेता हैं। उन्हें बेशुमार सफलताओं के कारण ‘वन मैन इंडस्ट्री’ कहा जाता है। लाखोँ दिलो की धड़कन, उनके चाहनेवालो के भगवान्, और महानायक Amitabh Bachchan की संशिप्त जानकारी।


अमिताभ बच्चन की जीवनी

मशहूर लेखक-निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास ने उन्हें अपनी फिल्म ‘सात हिंदुस्थानी’ (1969) में ब्रेक दिया। इसके बाद उन्हें ‘आनंद’ (1970) व ‘नमक हरम’ (1973) में उस दौर के सुपर स्टार राजेश खन्ना के साथ उत्कृष्ट अभिनय करने के लिए पहचाना गया, लेकिन ‘जंजीर’ (1973) से उन्हें ‘एंग्री यंग मैन’ की ऐतिहासिक इमेज मिली। ‘आनंद’ में राजेश खन्ना एवं ‘शक्ति’ (1982) में दिलीप कुमार के साथ अपनी श्रेष्ठता सिध्द कर उन्होंने हिंदी सिनेमा पर अपना एकछत्र साम्राज्य स्थापित कर लिया। अपने समय की प्रख्यात अभिनेत्री जया भादुड़ी उनकी पत्नी हैं।


अमिताभ बच्चन को ‘फिल्म फेयर पुरस्कार’, राष्ट्रीय पुरस्कार, ‘पदमश्री’ आदि सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उन पर बी.बी.सी. ने एक विशेष वृत्तचित्र भी बनाया है। साथ ही विश्व स्तर पर सर्वेक्षण से प्राप्त निष्कर्ष के आधार पर अमिताभ को ‘मिलेनियम ऑफ दि स्टार’ से भी सुशोभित किया है। वह सन 1985 में इलाहाबाद से लोक सभा के लिए चुने गए थे।

अमिताभ बच्चन की सबसे सफल फ़िल्में : Amitabh Bachchan Hit Movies

  • ‘आनंद’ (1970)
  • ‘नमक हराम’ (1973)
  • ‘अभिमान’ (1975)
  • ‘मिली’ (1970)
  • ‘दीवार’
  • ‘शोले’ (1975)
  • ‘अमर अकबर एंथोनी’ (1977)
  • ‘मुकद्दर का सिकंदर’ (1978)
  • ‘त्रिशूल’ (1978)
  • ‘सिलसिला’ (1981)
  • ‘शक्ति’ (1982)
  • ‘अग्निपथ’ (1990) आदि।



एक लंबे विराम के बाद अमिताभ की सिने-स्क्रीन पर फिर से वापसी हुई है। ‘अमिताभ बच्चन कपेरिशन लि. (ABCL) के नाम से उन्होंने एक कंपनी की स्थापना की है, जिसका उद्देश्य फिल्मों के वितरण के साथ ही सांस्कृतिक एवं संगीत संबंधी कार्यक्रम करना भी है। बंगलोर में आयोजित ‘द मिस वर्ल्ड ब्यूटी पेजेन्ट 96’ को भी इस कंपनी ने स्पोन्सर किया था।

अमिताभ बच्चन पुरस्कार Amitabh Bachchan Awards List

  1.  पद्म भूषण
  2. फिल्म फेयर पुरस्कार
  3. राष्ट्रीय पुरस्कार
  4. पदमश्री
आदित्यनाथ योगी का जीवन परिचय Yogi Adityanath Biography

आदित्यनाथ योगी का जीवन परिचय Yogi Adityanath Biography


आदित्यनाथ योगी का जीवन परिचय Yogi Adityanath Biography in Hindi

आदित्यनाथ योगी का जीवन परिचय : आदित्यनाथ एक भारतीय पुजारी और हिंदू राष्ट्रवादी राजनीतिज्ञ हैं, जो 26 मार्च 2017 से उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री हैं। योगी आदित्यनाथ की एक छवि हिंदुत्व फायरब्रांड के रूप में है।

योगी आदित्यनाथ गोरखपुर विधानसभा से 1998 के बाद से संसद सदस्य रहे हैं। वह गोरखनाथ मठ के मुख्य पुजारी भी हैं। योगी आदित्यनाथ ने हिंदू युवा वाहिनी, युवा संगठन की स्थापना की, जो सांप्रदायिक हिंसा में शामिल होने के लिए जाना जाता है।

योगी आदित्यनाथ प्रारंभिक जीवन और शिक्षा



योगी आदित्यनाथ का जन्म 5 जून 1972 को अजय मोहन बिष्ट के रूप में पंचार गांव में, उत्तर प्रदेश (अब उत्तराखंड) के पौड़ी गढ़वाल में हुआ था। उनके पिता आनंद सिंह बिष्ट वन रेंजर थे। उन्होंने उत्तराखंड में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय से गणित में अपनी स्नातक की डिग्री पूरी की।
अयोध्या राम मंदिर आंदोलन में शामिल होने के लिए उन्होंने 1990 के आसपास अपना घर छोड़ा। वह गोरखनाथ मठ के मुख्य पुजारी महंत अव्यानाथ के प्रभाव में आए और उनके शिष्य बने। इसके बाद, उन्हें ‘योगी आदित्यनाथ’ नाम दिया गया और महंत अव्यानाथ के उत्तराधिकारी के रूप में नामित किया गया। हालांकि गोरखपुर में अपनी स्थापना के बाद आधारित, आदित्यनाथ ने अक्सर अपने पैतृक गांव का दौरा किया, वहां एक स्कूल की स्थापना 1998 में हुई।

आदित्यनाथ योगी का जीवन परिचय : Yogi Adityanath Biography in Hindi



आदित्यनाथ ने 21 वर्ष की आयु में अपने परिवार को त्याग दिया और गोरखनाथ मठ के तत्कालीन महायाजक महंत अव्यानाथ के शिष्य बने। 12 सितंबर 2014 को उनके शिक्षक महंत आवेदनाथ की मृत्यु के बाद उन्हें गोरखनाथ गणित के महंत या महायाजक के पद पर पदोन्नत किया गया था। योगी आदित्यनाथ को 14 सितंबर 2014 को नाथ संप्रदाय के पारंपरिक अनुष्ठानों के बीच गणित के पीताधारीश्वर बनाया गया था।

योगी आदित्यनाथ राजनीति में कैरियर

योगी आदित्यनाथ को 1994 में गोरखनाथ के प्रमुख पुजारी के रूप में नियुक्त किया गया था और चार साल बाद वह भारतीय संसद के निचले सदन के लिए चुने गए थे। वह 12 वीं लोकसभा में सबसे कम उम्र के सदस्य थे। लगातार पांच वर्षों तक, वह गोरखपुर से संसद के लिए चुने गए हैं।

आदित्यनाथ योगी भाजपा के साथ संबंध



प्रारंभ में योगी आदित्यनाथ के पास भाजपा के साथ एक सुसंगत संबंध नहीं था। हालांकि, धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो गया और गोरखपुर में कई भाजपा नेताओं ने उनका दौरा किया। वह मार्च 2010 में भाजपा सांसदों में से एक थे जिन्होंने संसद में महिला आरक्षण विधेयक पर पार्टी कोड़ा को चुनौती दी थी।
योगी आदित्यनाथ, उत्तर प्रदेश के 2017 विधानसभा चुनावों में एक प्रमुख भाजपा प्रचारक थे। मार्च 2017 में, भाजपा ने विधानसभा चुनाव जीता था, वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। सत्ता में आने के बाद, उन्होंने उत्तर प्रदेश के सरकारी कार्यालयों में गाय तस्करी, तम्बाकू, पैन और गुटका पर प्रतिबंध लगा दिया और राज्य में विरोधी-रोमीओ दस्ते बनाए। इसके अलावा उत्तर प्रदेश पुलिस ने 100 से ज्यादा पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया।

मुख्य मंत्री का प्रोफ़ाइल रखने के साथ-साथ वह गृह, आवास, राजस्व, खाद्य और नागरिक आपूर्ति, खाद्य सुरक्षा और दवा प्रशासन, टिकट और रजिस्ट्री, टाउन और देश नियोजन विभाग, अर्थशास्त्र और सांख्यिकी सहित लगभग 36 मंत्रालयों की देखभाल कर रहे हैं।
प्रभास की जीवनी Prabhas Biography

प्रभास की जीवनी Prabhas Biography

प्रभास की जीवनी : Prabhas Biography 


प्रभास की जीवनी : Prabhas Biography

प्रभास का प्रारंभिक जीवन


प्रभास एक भारतीय फिल्म अभिनेता है जो तेलुगू सिनेमा में अपने काम के लिए प्रसिद्ध है। प्रभास जिनका पूरा नाम हैं वेंकट सत्यनारायण प्रभास राजू उप्पालापाटि हैं उनका जन्म फिल्म निर्माता यू. सूर्यनारायण राजू उप्पालापाटि और उनकी पत्नी शिव कुमारी के घर में हुआ था। वह तीनों बच्चों में सबसे छोटा है, एक बड़े भाई प्रमोद उप्पालापाटि और बहन प्रगती के हैं। उनके चाचा तेलगु अभिनेता कृष्णम राजू उप्पालापाटि हैं। प्रभास डीएनआर स्कूल, भीमवरम से बी.टेक के साथ स्नातक हैं और श्री चैतन्य कॉलेज, हैदराबाद से डिग्री ली हैं।

प्रभास कैरियर

प्रभास ने 2002 में ईश्वर के साथ अपना फिल्म कैरियर शुरू किया था। 2003 में, वह राघवेंद्र में मुख्य भूमिका में थे। 2004 में, वह वर्धन में दिखाई दिए उन्होंने अपने कैरियर को “एडवी रामुडू” और “चक्रम” के साथ जारी रखा।
2005 में उन्होंने एस. एस. राजमुली द्वारा निर्देशित फिल्म “छतरपाठी” में अभिनय किया, जिसमें उन्होंने एक शरणार्थी की भूमिका निभाई।

बाद में उन्होंने “पौरनामी”, “योगी” और “मुन्ना” में अभिनय किया, एक एक्शन ड्रामा फिल्म 2007 में आई, उसके बाद 2008 में एक्शन कॉमेडी “बुजजीगाडू” ने अभिनय किया।

2010 में वह रोमांटिक कॉमेडी “डार्लिंग” में और 2011 में, “श्री परफेक्ट”, में दिखाई दिये। 2012 में, प्रभास ने “रिबेल” में अभिनय किया, राघव लॉरेंस द्वारा निर्देशित “एक्शन” फिल्म बादमें उनकी अगली फिल्म मिरची थी।

2015 में वह एस.एस. राजमौली के महाकाव्य बाहुबली: द बिगिन में शिवडू / महेंद्र बाहुबली और अमररेन्द्र बाहुबली के रूप में दिखाई दिए। यह फिल्म भारत भर क्या दुनिया भर में तीसरी सबसे बड़ी कमाई करने वाली फिल्म बन गई है और इस फ़िल्म की दुनिया भर में आलोचकों और व्यावसायिक प्रशंसा की गई है।
28 अप्रैल 2017 को बाहुबली : द बिज़िनिंग की अगली कड़ी, बाहुबली 2: द कॉन्क्लूज़न रिलीज हुईं और उसको आज भी दुनिया भर में पसंद किया गया हैं।

प्रभास की फिल्मों की सूची

  • Eeshwar2002 – (Telugu)
  • Raghavendra 2003 – (Telugu)
  • Adavi Ramudu 2004 – (Telugu)
  • Chatrapathi 2005 – (Telugu)
  • Chakram 2005 – (Telugu)
  • Pournami 2006 – (Telugu)
  • Yogi 2007 – (Telugu)
  • Dhee 2007 – (Telugu)
  • Munna 2007 – (Telugu)
  • Bujjigadu 2008 – (Telugu)
  • Billa 2009 – (Telugu)
  • Darling 2010 – (Telugu)
  • Mr. Perfect2011 – (Telugu)
  • Rebel 2012 – (Telugu)
  • Mirchi 2013 – (Telugu)
  • Baahubali: The Beginning 2015 – (Telugu , Tamil, Hindi)
  • Baahubali 2: The Conclusion2017 – (Telugu , Tamil, Hindi)

Monday, 13 November 2017

संतरा खाने के फायदे orange benefits in hindi

संतरा खाने के फायदे orange benefits in hindi

संतरा खाने के फायदे क्या है orange benefits 

संतरा खाने के फायदे क्या है orange benefits

संतरे में विभिन्न प्रकार के विटामिन और अन्य महत्वपूर्ण तत्व उपस्थित होते हैं आइए जानते हैं हमारे शरीर के लिए संतरे खाने के फायदे किस प्रकार महत्वपूर्ण है-

orange के फायदे हिंदी में  orange benefits for skin in hindi

  • संतरे में "विटामिन सी" भरपूर मात्रा में होता है जिसेसे यह हमारे शरीर की प्रतिदिन आवश्यक 72 प्रतिशत "विटामिन सी" की मात्र को पूरा करता है।
  • विटामिन सी के अलावा संतरे में विटामिन ए की मात्रा में पाई जाती है जिसके कारण ये हमारी त्वचा को स्वस्थ रखने में मदद करता है।
  • संतरे में बीटा कैरोटीन, जेक्सनथिन पाया जाता है। यह हमारी आंखों में उपस्थित म्यूकस मेम्बरनेस को स्वस्थ रखता है।
  • संतरे में विटामिन सी की मात्रा होने की वजह से ही है हमें दिल के रोगों से बचाता है।
  • संतरे में फोलेट एसिड और विटामिन बी 9 होता है जोकि वाइटल ऑर्गन को मिंट कंडीशन में रखता है।
  • संतरे में डी-लिमोनेन कंपाउंड होता है जोकि बिभिन्न प्रकार कैंसर से हमारी रक्षा करता है।
  • संतरे में सॉल्युबल और इंसोल्युबले फाइबर पाया जाता है जोकि हमारे पेट को स्वस्थ रखता है।
दोस्तों अगर आपको यह जानकारी संतरा खाने के फायदे और इसके उपयोग पसंद आई हो तो कृपया लाइक, कमेंट और शेयर करना ना भूलें
और साथ में हमें फॉलो करें ताकि आपको हर रोज इस तरह की पोस्ट पढ़ने को मिलती रहे धन्यवाद।
सेहत के लिए अदरक खाने के फायदे ginger ke fayde hindi

सेहत के लिए अदरक खाने के फायदे ginger ke fayde hindi

सेहत के लिए अदरक खाने के फायदे ginger ke fayde hindi

अदरक है सेहत के लिए बहुत ही जरुरी, ginger ke fayde hindi

प्राचीन काल से ही अदरक का प्रयोग विभिन्न रोगों के लिए विभिन्न प्रकार से किया जाता है। अदरक में विशेष गुण होते हैं। आइये अदरक के फायदे इन हिंदी में  -

अदरक के औषधीय गुण और उसके फायदे 



  • अदरक फंगल इन्फेक्शन में बहुत ही लाभदायक है। अदरक की कुछ बूंदों को नारियल के तेल में मिलाकर फंगल इंफेक्शन से ग्रसित अंगों पर लगाने से शीघ्र ही लाभ मिलता है।
  • अदरक में हर प्रकार के दर्द को कम करने का गुण होता है। अदरक "वैनिलिओइड रिसेप्टर्स" पर काम करता है जोकि सेंसरी नर्व में पाया जाता है।
  • अदरक में "नैचुरली इम्प्रूव डायबिटीज" का गुण होता है और इन्सुलिन सेंसिटिविटी को बढ़ाता है।
  • अदरक की छोटे टुकड़े को पीसकर गुनगुने पानी मे मिलाकर पीने से गले की खराश, खासी और जुकाम को राहत मिलती है।
  • थोड़े से अदरक के रस को गुनगुने पानी मे डालकर पीने से पीरियड्स में होने बाले दर्द और क्रेम्पस से राहत मिलती है।
दोस्तों और आपको यह जानकारी अदरक के फायदे पसंद आई हो तो कृपया लाइक, कमेंट और शेयर करना ना भूलें,साथ में हमें फॉलो करें ताकि आपको हर रोज नई जानकारी मिलती रहे धन्यबाद।
किशमिश खाने से ये 4 रोग जड़ से समाप्त हो जाते है health benefits of raisins

किशमिश खाने से ये 4 रोग जड़ से समाप्त हो जाते है health benefits of raisins

किशमिश के औषधीय गुण अंगूर को सुखाने के बाद ये किसमिस का रूप लेते हैं। जो गुण अंगूर में पाए जाते हैं वहीं गुण किसमिस में भी होते है। किसमिस सभी लोगो का पसंदीदा होता है खास कर बच्चो का, सांस्कृतिक व्यंजन बनाने में इसका प्रयोग मुख्य रूप से होता है। ये हमारे स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक है। इसके सेवन से अनेक प्रकार के रोग दूर रहते हैं। आइए जानते है किसमिस के गुण के बारे में।


किसमिस के चमत्कारी फायदे हिंदी में health benefits of raisins




1. कैंसर को रोकती है  

किसमिस खाने से हमारे शरीर के अंग प्रणालियों और कोशिकाओं पर प्रभाव पड़ता हैं इसलिए किसमिस के सेवन से आप कैंसर को रोक सकते हैं.

मुनक्का खाने के फायदे

2. हड्डियों के लिए  

किसमिस में कैल्शियम की भरपूर मात्रा होती है जो हमारी हड्डियों के लिए बहुत जरूरी है। इसके अलावा इसमें पोटैसियम और अन्य पोषक तत्व भी हैं जो हमारी हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करता है।

3. वजन बढ़ाने में  

स्वस्थ तरीके से वजन को बढ़ाने के लिए किसमिस बहुत अच्छा उपाय हैं क्योंकि ये ग्लूकोज से भरपूर होती हैं और इसमें बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा होती हैं। जो हमारे कम वजन को बढ़ाने में मदद करता है।

4. कब्ज से राहत  

कब्ज से छुटकारा पाने के लिए भी आप इसका सेवन कर सकते हैं। ये पेट में जाने के बाद वहां के पानी को सोख लेती है जिस वजह से इसके सेवन से कब्ज से राहत मिलता है।

खाते है अंडा तो इस खबर को जरूर पढ़ें Benefits of Eating Egg

खाते है अंडा तो इस खबर को जरूर पढ़ें Benefits of Eating Egg

सेहत के लिए अंडा प्रिय दोस्तों आज हम आपके लिए एक बहुत ही अच्छी खबर लेकर आए हैं ऐसे बहुत से लोग हैं जो अंडे का सेवन सिर्फ प्रोटीन पाने के लिए करते हैं.लेकिन अगर आप रोजाना अंडे का इस्तेमाल करेंगे तो आपको बहुत ज्यादा लाभ होगा.इसके बारे में आप लोगों को शायद नहीं पता है.तो चलिए आप सभी लोगों को आज हम बताते हैं अंडे के फायदे क्या है।

अंडा खाने के फायदे क्या है Benefits of Eating Egg


अंडा खाने के फायदे क्या है Benefits of Eating Egg 





   ऊर्जा   

यदि आप बहुत कठिन कार्य करते हैं यानी कि ज्यादा मेहनत वाला तो आप अंडे का इस्तेमाल जरुर कीजिए क्योंकि इसे खाने के तुरंत बाद ही आपको ऊर्जा मिलती है.जिसे आप नहीं थकेंगे और अपना काम कर पाएंगे।

  शरीर को मजबूत बनाना  

यदि कोई भी व्यक्ति अंडे का प्रतिदिन सेवन करता है तो उसका शरीर मजबूत और ताकतवर बन जाएगा.क्योंकि इसमें प्रोटीन और विटामिन भरपूर मात्रा में पाया जाता है.जो शरीर को मजबूत और फौलादी बनाने में मदद करता है.इसके सेवन से आप स्वस्थ भी रहेंगे।

egg nutritional benefits


  दर्द में बहुत ही फायदेमंद है अंडा  

हर अंडे का सेवन करने वाला व्यक्ति जानता है कि उसके दर्द अन्य व्यक्तियों के अपेक्षा दर्द कम होता है.क्योंकि हमारी हड्डियां मजबूत होते हैं इसमें प्रोटीन और विटामिन बहुत ही अधिक मात्रा में पाया जाता है अंडा खाने के फायदे बहुत होते है.

अगर आपको हमारी खबर अच्छी लगे तो फॉलो करना ना भूले।


जरुर पढ़ें खीरा के गुण cucumber benefits

जरुर पढ़ें खीरा के गुण cucumber benefits

खीरा के गुण cucumber benefits

खीरा खाने से होते है ये 5 महत्वपूर्ण फायदे, जरुर पढ़ें


खीरे की खेती दुनियाभर में की जाती है। इसका प्रयोग सामान्यतः सलाद के रूप में किया जाता है। आइए जानते हैं खीरे के महत्वपूर्ण गुण क्या है-

cucumber benefits and side effects



  • खीरा विटामिन बी का अच्छा स्रोत माना जाता है। इसमें विटामिन बी1, विटामिन बी5, और विटामिन बी7 होता है जो कि हमारे दिमाग से एंग्जायटी और स्ट्रेस को दूर करने में सहायक है।

  • खीरे का सेवन करने से हमारे मुंह के हानिकारक बैक्टीरिया से हमें छुटकारा मिलता है। खीरा हमारे पेट में होने वाली जलन को शांत करता है और पेट को ठंडक प्रदान है।

  • खीरे में पानी और फाइबर की मात्रा अधिक होती है। खीरे का जूस या सलाद का प्रयोग करने से यह हमारे शरीर में होने वाली फाइबर की कमी को पूरा करता है।

  • खीरे में कैलोरीज बहुत कम होती है( एक कप खीरे की सलाद में लगभग 16 कैलोरीज होती हैं) जो कि हमारी डाइजेशन की गति को धीमा करने के लिए महत्वपूर्ण होता है। इसलिए वजन को कंट्रोल करने के लिए फाइबर युक्त भोजन करना अति आवश्यक होता है।


  • खीरे में पोटेशियम की मात्रा होती है, जोकि ब्लड प्रेशर को कम करता है। हमारे शरीर के लिए पोटेशियम बहुत जरूरी तत्व होता है। हमारे शरीर के भीतरी कोशिकाओं को सही रूप में कार्य करने के लिए पोटेशियम बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व होती है।


दोस्तों आपको ये जानकारी कैसी लगी? कृपया लाइक और कमेंट जरुर करें।हर रोज़ महत्वपूर्ण जानकारी पाने के लिए हमे फोलो भी करे ।
रोज़ अनार खाने के 10 फायदे आपको पता भी नहीं होंगे pomegranate benefits

रोज़ अनार खाने के 10 फायदे आपको पता भी नहीं होंगे pomegranate benefits

रोज़ अनार खाने के 10 फायदे आपको पता भी नहीं होंगे pomegranate benefits

अनार  pomegranate benefits

अनार एक लाभकारी फल होता है। जो कि किसी भी मौसम में खाया जा सकता है। आइए जानते हैं अनार के लाभकारी गुण क्या है -



  • अनार में पुनिसिक एसिड, एलेजिक एसिड और ओमेगा 5 पाया जाता है जोकि कोशिका का रीजनरेशन और प्रोलीफेरशन करता है।
  • प्रत्येक दिन अनार का सेवन घातक कोलेस्ट्रॉल को कम करता है और अच्छे कोलेस्ट्रॉल का निर्माण करता है।
  • इसमें एन्टी-बैक्टीरियल और एन्टी-माइक्रोबायल गुण होते हैं जोकि हमारे शरीर के इम्यून सिस्टम को बनाये रखता है और हमें स्वस्थ रखता है।
  • ये भूख को बढ़ाता है और प्यास को कम करता है। ये हमारे पेट के लिए अच्छे टॉनिक की तरह काम करता है।
  • इसमें आयरन की मात्रा होती है जोकि एनीमिया से हमारा बचाव करता है।
  • ये यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन को ठीक करने में अति लाभकारी है।
  • pomegranate benefits for weight loss पुनिकलगिन्स एक तत्व होता है जोकि केवल अनार में पाया जाता है। जोकि हमारे दिल और ब्लड वेसल्स के लिए अति लाभकारी होता है।
  • ये हमारे दिमाग की सोचने की शक्ति को बढ़ाता है
  • ये ऑस्टिओकरथीरिटिस, आर्थराइटिस और हड्डियों के इंफ्लामेंशन से हमें आराम देता है।
  • इसमे विटामिन A, C, E और फोलिक एसिड पाया जाता है। हर रोज़ अनार खाने से ये विटामिन की कमी को पूरा करता है।

पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लाइक और शेयर करें और हमे फॉलो करें।
रोजाना एक टमाटर खाने के फायदे जानकर चौंक जायेंगे आप

रोजाना एक टमाटर खाने के फायदे जानकर चौंक जायेंगे आप

रोजाना एक टमाटर खाने के फायदे जानकर चौंक जायेंगे आप health benefits of tomato

health benefits of tomato

टमाटर को अक्सर एक सब्जी माना जाता है, हालांकि वास्तविकता में यह एक फल हैं, टमाटर में विटामिन ए, सी, फोलेट, पोटेशियम युक्त थायामिन, विटामिन बी 6, मैग्नीशियम और फास्फोरस होता है जो आपके स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक हैं।


टमाटर के स्वास्थ्य लाभ कुछ इस प्रकार है:tomato benefits 

  ➤ त्वचा को स्वस्थ रखता है  

टमाटर में लाइकोपीन होता है, जो एक एंटीऑक्सिडेंट है, यह आपकी त्वचा को सूरज की क्षति से बचाता है। यह त्वचा पराबैंगनी प्रकाश की क्षति और झुर्रियों के मुख्य कारणों को कम करता है। इसके अलावा, बड़े छिद्रों को कम करने के लिए टमाटर का इस्तेमाल किया जा सकता है।

  ➤ हड्डियों स्वास्थ्य रखता है  

विटामिन k और कैल्शियम की उपस्थिति के कारण टमाटर आपकी हड्डियों के लिए अच्छा हैं। दोनों ही तत्व हड्डियों को मजबूत बनाने और मरम्मत करने के लिए उत्कृष्ट हैं।

  ➤ कैंसर को ठीक करने में
कैंसर से बचने के लिए रोज एक टमाटर जरूर खाएं।