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Tuesday, 21 November 2017

रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी Jhansi Rani Biography

रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी Jhansi Rani Biography

रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी Jhansi Rani Biography In Hindi

रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी Jhansi Rani Biography

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म - 19 नवम्बर 1828, वाराणसी, उत्तर प्रदेश

रानी लक्ष्मीबाई का स्वर्गवास - 18 जून 1858, कोटा की सराय, ग्वालियर

रानी लक्ष्मीबाई का जीवन सफर - Jhansi Rani Biography in hindi


रानी लक्ष्मीबाई मराठा शासित झाँसी राज्य की रानी और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना थीं। बलिदानों की धरती भारत में ऐसे-ऐसे वीरों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने रक्त से देश प्रेम की अमिट गाथाएं लिखीं। यहाँ की ललनाएं भी इस कार्य में कभी किसी से पीछे नहीं रहीं, उन्हीं में से एक का नाम है- झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई। उन्होंने न केवल भारत की बल्कि विश्व की महिलाओं को गौरवान्वित किया। उनका जीवन स्वयं में वीरोचित गुणों से भरपूर, अमर देशभक्ति और बलिदान की एक अनुपम गाथा है।

रानी लक्ष्मीबाई मराठा शासित झांसी की रानी और भारत की स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम वनिता थीं। भारत को दासता से मुक्त करने के लिए सन् 1857 में बहुत बड़ा प्रयास हुआ। यह प्रयास इतिहास में भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम या सिपाही स्वतंत्रता संग्राम कहलाता है।

अंग्रेज़ों के विरुद्ध रणयज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाले योद्धाओं में वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का नाम सर्वोपरी माना जाता है। 1857 में उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम का सूत्रपात किया था। अपने शौर्य से उन्होंने अंग्रेज़ों के दाँत खट्टे कर दिए थे।

अंग्रेज़ों की शक्ति का सामना करने के लिए उन्होंने नये सिरे से सेना का संगठन किया और सुदृढ़ मोर्चाबंदी करके अपने सैन्य कौशल का परिचय दिया था।

झाँसी का युद्ध:

उस समय भारत के बड़े भू-भाग पर अंग्रेज़ों का शासन था। वे झाँसी को अपने अधीन करना चाहते थे। उन्हें यह एक उपयुक्त अवसर लगा। उन्हें लगा रानी लक्ष्मीबाई स्त्री है और हमारा प्रतिरोध नहीं करेगी। उन्होंने रानी के दत्तक-पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और रानी को पत्र लिख भेजा कि चूँकि राजा का कोई पुत्र नहीं है, इसीलिए झाँसी पर अब अंग्रेज़ों का अधिकार होगा। रानी यह सुनकर क्रोध से भर उठीं एवं घोषणा की कि मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी। अंग्रेज़ तिलमिला उठे। परिणाम स्वरूप अंग्रेज़ों ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने भी युद्ध की पूरी तैयारी की। क़िले की प्राचीर पर तोपें रखवायीं। रानी ने अपने महल के सोने एवं चाँदी के सामान तोप के गोले बनाने के लिए दे दिया।

रानी के क़िले की प्राचीर पर जो तोपें थीं उनमें कड़क बिजली, भवानी शंकर, घनगर्जन एवं नालदार तोपें प्रमुख थीं। रानी के कुशल एवं विश्वसनीय तोपची थे गौस खाँ तथा ख़ुदा बक्श। रानी ने क़िले की मज़बूत क़िलाबन्दी की। रानी के कौशल को देखकर अंग्रेज़ सेनापति सर ह्यूरोज भी चकित रह गया। अंग्रेज़ों ने क़िले को घेर कर चारों ओर से आक्रमण किया।

अंग्रेज़ों की कूटनीति:

अंग्रेज़ आठ दिनों तक क़िले पर गोले बरसाते रहे परन्तु क़िला न जीत सके। रानी एवं उनकी प्रजा ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि अन्तिम सांस तक क़िले की रक्षा करेंगे। अंग्रेज़ सेनापति ह्यूराज ने अनुभव किया कि सैन्य-बल से क़िला जीतना सम्भव नहीं है। अत: उसने कूटनीति का प्रयोग किया और झाँसी के ही एक विश्वासघाती सरदार दूल्हा सिंह को मिला लिया जिसने क़िले का दक्षिणी द्वार खोल दिया। फिरंगी सेना क़िले में घुस गई और लूटपाट तथा हिंसा का पैशाचिक दृश्य उपस्थित कर दिया। घोड़े पर सवार, दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिए, पीठ पर पुत्र को बाँधे हुए रानी ने रणचण्डी का रूप धारण कर लिया और शत्रु दल संहार करने लगीं। झाँसी के वीर सैनिक भी शत्रुओं पर टूट पड़े। जय भवानी और हर-हर महादेव के उद्घोष से रणभूमि गूँज उठी। किन्तु झाँसी की सेना अंग्रेज़ों की तुलना में छोटी थी। रानी अंग्रेज़ों से घिर गयीं। कुछ विश्वासपात्रों की सलाह पर रानी कालपी की ओर बढ़ चलीं। दुर्भाग्य से एक गोली रानी के पैर में लगी और उनकी गति कुछ धीमी हुई। अंग्रेज़ सैनिक उनके समीप आ गए।

रानी लक्ष्मीबाई मृत्यु:

रानी को असहनीय वेदना हो रही थी परन्तु मुखमण्डल दिव्य कान्त से चमक रहा था। उन्होंने एक बार अपने पुत्र को देखा और फिर वे तेजस्वी नेत्र सदा के लिए बन्द हो गए। वह 17 जून, 1858 का दिन था, जब क्रान्ति की यह ज्योति अमर हो गयी। उसी कुटिया में उनकी चिता लगायी गई जिसे उनके पुत्र दामोदर राव ने मुखाग्नि दी। रानी का पार्थिव शरीर पंचमहाभूतों में विलीन हो गया और वे सदा के लिए अमर हो गयीं। इनकी मृत्यु ग्वालियर में हुई थी। विद्रोही सिपाहियों के सैनिक नेताओं में रानी सबसे श्रेष्ठ और बहादुर थी और उसकी मृत्यु से मध्य भारत में विद्रोह की रीढ़ टूट गई।

Monday, 20 November 2017

सरदार भगत सिंह का जीवन परिचय

सरदार भगत सिंह का जीवन परिचय

सरदार भगत सिंह का जीवन परिचय

सरदार भगत सिंह का जीवन परिचय Bagat Singh Biography In Hindi

सरदार भगतसिंह का नाम विश्व में 20वीं शताब्दी के अमर शहीदों में बहुत ऊँचा है। भगतसिंह ने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है। भगतसिंह अपने देश के लिये ही जीये और उसी के लिए शहीद भी हो गये।

क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में:

1919 में रॉलेक्ट एक्ट के विरोध में संपूर्ण भारत में प्रदर्शन हो रहे थे और इसी वर्ष 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग़ काण्ड हुआ । इस काण्ड का समाचार सुनकर भगतसिंह लाहौर से अमृतसर पहुँचे। देश पर मर-मिटने वाले शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि दी तथा रक्त से भीगी मिट्टी को उन्होंने एक बोतल में रख लिया, जिससे सदैव यह याद रहे कि उन्हें अपने देश और देशवासियों के अपमान का बदला लेना है ।

असेम्बली बमकाण्ड:

गंभीर विचार-विमर्श के पश्चात् 8 अप्रैल 1929 का दिन असेंबली में बम फेंकने के लिए तय हुआ और इस कार्य के लिए भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त निश्चित हुए। यद्यपि असेंबली के बहुत से सदस्य इस दमनकारी क़ानून के विरुद्ध थे तथापि वायसराय इसे अपने विशेषाधिकार से पास करना चाहता था। इसलिए यही तय हुआ कि जब वायसराय पब्लिक सेफ्टी बिल को क़ानून बनाने के लिए प्रस्तुत करे, ठीक उसी समय धमाका किया जाए और ऐसा ही किया भी गया। जैसे ही बिल संबंधी घोषणा की गई तभी भगत सिंह ने बम फेंका। इसके पश्चात् क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करने का दौर चला। भगत सिंह और बटुकेश्र्वर दत्त को आजीवन कारावास मिला।
भगत सिंह और उनके साथियों पर लाहौर षड़यंत्र का मुक़दमा भी जेल में रहते ही चला। भागे हुए क्रांतिकारियों में प्रमुख राजगुरु पूना से गिरफ़्तार करके लाए गए। अंत में अदालत ने वही फैसला दिया, जिसकी पहले से ही उम्मीद थी। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को मृत्युदंड की सज़ा मिली।

फाँसी की सज़ा:

23 मार्च 1931 की रात भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु देशभक्ति को अपराध कहकर फाँसी पर लटका दिए गए। यह भी माना जाता है कि मृत्युदंड के लिए 24 मार्च की सुबह ही तय थी, लेकिन जन रोष से डरी सरकार ने 23-24 मार्च की मध्यरात्रि ही इन वीरों की जीवनलीला समाप्त कर दी और रात के अंधेरे में ही सतलुज के किनारे उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया। लाहौर षड़यंत्र के मुक़दमे में भगतसिंह को फ़ाँसी की सज़ा मिली तथा 23 वर्ष 5 माह और 23 दिन की आयु में ही, 23 मार्च 1931 की रात में उन्होंने हँसते-हँसते संसार से विदा ले ली। भगतसिंह के उदय से न केवल अपने देश के स्वतंत्रता संघर्ष को गति मिली वरन् नवयुवकों के लिए भी प्रेरणा स्रोत सिद्ध हुआ। वे देश के समस्त शहीदों के सिरमौर थे। 24 मार्च को यह समाचार जब देशवासियों को मिला तो लोग वहाँ पहुँचे, जहाँ इन शहीदों की पवित्र राख और कुछ अस्थियाँ पड़ी थीं। देश के दीवाने उस राख को ही सिर पर लगाए उन अस्थियों को संभाले अंग्रेज़ी साम्राज्य को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेने लगे। देश और विदेश के प्रमुख नेताओं और पत्रों ने अंग्रेज़ी सरकार के इस काले कारनामे की तीव्र निंदा की।

Saturday, 18 November 2017

मंगल पांडे की जीवनी Mangal Pandey Biography

मंगल पांडे की जीवनी Mangal Pandey Biography

मंगल पांडे की जीवनी

मंगल पांडे का लोकप्रिय नारा -  मारो फ़िरंगी को!!!

मंगल पांडे का जन्म - 30 जनवरी 1831, नगवा गांव, बलिया जिला

मंगल पांडे का स्वर्गवास - 8 अप्रैल 1857, बैरकपुर, पश्चिम बंगाल

मंगल पांडे का जीवन सफर : मंगल पांडे की जीवनी


मंगल पांडे अथवा मंगल पान्डेय का नाम भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अग्रणी योद्धाओं के रूप में लिया जाता है, जिनके द्वारा भड़काई गई क्रांति की ज्वाला से अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन बुरी तरह हिल गया था। मंगल पांडे की शहादत ने भारत में पहली क्रांति के बीज बोए थे। ब्रह्मदेश (बर्मा {वर्तमान म्यांमार}) पर विजय तथा सिक्ख युद्ध की समाप्ति के पश्चात अंग्रेज़ों ने भारतवर्ष पर निष्कंटक राज्य करने के सपने देखें होंगे; पर उन्हें क्या पता था कि सन 1857 का वर्ष उनकी आशाओं पर तुषारपात का वर्ष सिद्ध होगा।

जंग-ए-आज़ादी:

भारतीय इतिहास में 29 मार्च, 1857 का दिन अंग्रेजों के लिए दुर्भाग्य के दिन के रूप में उदित हुआ। पाँचवी कंपनी की चौंतीसवीं रेजीमेंट का 1446 नं. का सिपाही वीरवर मंगल पांडे अंग्रेज़ों के लिए प्रलय-सूर्य के समान निकला। बैरकपुर की संचलन भूमि में प्रलयवीर मंगल पांडे का रणघोष गूँज उठा-

बंधुओ! उठो! उठो! तुम अब भी किस चिंता में निमग्न हो? उठो, तुम्हें अपने पावन धर्म की सौगंध! चलो, स्वातंत्र्य लक्ष्मी की पावन अर्चना हेतु इन अत्याचारी शत्रुओं पर तत्काल प्रहार करो।



मंगल पांडे के बदले हुए तेवर देखकर अंग्रेज़ सारजेंट मेजर ह्यूसन उसने पथ को अवरुद्ध करने के लिए आगे बढ़ा। उसने उस विद्रोही को उसकी उद्दंडता का पुरस्कार देना चाहा। अपनी कड़कती आवाज़ में उसने मंगल पांडे को खड़ा रहने का आदेश दिया। वीर मंगल पांडे के अरमान मचल उठे। वह शिवशंकर की भाँति सन्नद्ध होकर रक्तगंगा का आह्वान करने लगा। उसकी सबल बाहुओं ने बंदूक तान ली। उसकी सधी हुई उँगलियों ने बंदूक का घोड़ा अपनी ओर खींचा और घुड़ड़ घूँsss का तीव्र स्वर घहरा उठा। मेजर ह्यसन घायल कबूतर की भाँति भूमि पर तड़प रहा था। उसका रक्त भारत की धूल चाट रहा था। 1857 के क्रांतिकारी ने एक फिरंगी की बलि ले ली थी। विप्लव महायज्ञ के पुरोधा मंगल पांडे की बंदूक पहला स्वारा बोल चुकी थी। स्वातंत्र्य यज्ञ की वेदी को दस्यु-देह की समिधा अर्पित हो चुकी थी।

अंग्रेज़ी सेना द्वारा बंदी:

वीर मंगल पांडे ने अपने कर्तव्य की पूर्ति कर दी थी। शत्रु के रक्त से भारत भूमि का तर्पण किया था। मातृभूमि की स्वाधीनता जैसे महत कार्य के लिए अपनी रक्तांजलि देना भी अपना पावन कर्तव्य समझा। मंगल पांडे ने अपनी बंदूक अपनी छाती से अड़ाकर गोली छोड़ दी। गोली छाती में सीधी न जाती हुई पसली की तरफ फिसल गई और घायल मंगल पांडे अंग्रेज़ी सेना द्वारा बंदी बना लिये गये। अंगेज़ों ने भरसक प्रयत्न किया कि वे मंगल पांडे से क्रांति योजना के विषय में उसके साथियों के नाम-पते पूछ सकें; पर वह मंगल पांडे थे, जिनका मुँह अपने साथियों को फँसाने के लिए खुला ही नहीं।



कारतूस घटना:

1857 के विद्रोह का प्रारम्भ एक बंदूक की वजह से हुआ था। सिपाहियों को 1853 में एनफ़ील्ड बंदूक दी गयी थीं, जो कि 0.577 कैलीबर की बंदूक थी तथा पुरानी और कई दशकों से उपयोग में लायी जा रही ब्राउन बैस के मुकाबले में शक्तिशाली और अचूक थी। नयी बंदूक में गोली दागने की आधुनिक प्रणाली का प्रयोग किया गया था, परन्तु बंदूक में गोली भरने की प्रक्रिया पुरानी थी। नयी एनफ़ील्ड बंदूक भरने के लिये कारतूस को दांतों से काट कर खोलना पड़ता था और उसमे भरे हुए बारूद को बंदूक की नली में भर कर कारतूस में डालना पड़ता था। कारतूस का बाहरी आवरण में चर्बी होती थी, जो कि उसे नमी अर्थात पानी की सीलन से बचाती थी।

सिपाहियों के बीच अफ़वाह फ़ैल चुकी थी कि कारतूस में लगी हुई चर्बी सुअर और गाय के मांस से बनायी जाती है। यह हिन्दू और मुसलमान सिपाहियों दोनों की धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध था। अंग्रेज अफ़सरों ने इसे अफवाह बताया और सुझाव दिया कि सिपाही नये कारतूस बनायें, जिसमें बकरे या मधुमक्क्खी की चर्बी प्रयोग की जाये। इस सुझाव ने सिपाहियों के बीच फ़ैली इस अफवाह को और मज़बूत कर दिया। दूसरा सुझाव यह दिया गया कि सिपाही कारतूस को दांतों से काटने की बजाय हाथों से खोलें। परंतु सिपाहियों ने इसे ये कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि वे कभी भी नयी कवायद को भूल सकते हैं और दांतों से कारतूस को काट सकते हैं। तत्कालीन अंग्रेज अफ़सर प्रमुख (भारत) जार्ज एनसन ने अपने अफ़सरों की सलाह को दरकिनार हुए इस कवायद और नयी बंदूक से उत्पन्न हुई समस्या को सुलझाने से मना कर दिया।

29 मार्च सन् 1857 को नए कारतूस को प्रयोग करवाया गया, मंगल पांडे ने आज्ञा मानने से मना कर दिया और धोखे से धर्म को भ्रष्ट करने की कोशिश के ख़िलाफ़ उन्हें भला-बुरा कहा, इस पर अंग्रेज अफ़सर ने सेना को हुकम दिया कि उसे गिरफ्तार किया जाये, सेना ने हुक्म नहीं माना। पलटन के सार्जेंट हडसन स्वंय मंगल पांडे को पकड़ने आगे बढ़ा तो, पांडे ने उसे गोली मार दी, तब लेफ्टीनेंट बल आगे बढ़ा तो उसे भी पांडे ने गोली मार दी। घटनास्थल पर मौजूद अन्य अंग्रेज़ सिपाहियों नें मंगल पांडे को घायल कर पकड़ लिया। उन्होंने अपने अन्य साथियों से उनका साथ देने का आह्वान किया। किन्तु उन्होंने उनका साथ नहीं दिया। उन पर मुक़दमा (कोर्ट मार्शल) चलाकर 6 अप्रैल, 1857 को मौत की सज़ा सुना दी गई।

मंगल पांडे निधन:

फ़ौजी अदालत ने न्याय का नाटक रचा और फैसला सुना दिया गया। 8 अप्रैल का दिन मंगल पांडे की फाँसी के लिए निश्चित किया गया। बैरकपुर के जल्लादों ने मंगल पांडे के पवित्र ख़ून से अपने हाथ रँगने से इनकार कर दिया। तब कलकत्ता से चार जल्लाद बुलाए गए। 8 अप्रैल, 1857 के सूर्य ने उदित होकर मंगल पांडे के बलिदान का समाचार संसार में प्रसारित कर दिया। भारत के एक वीर पुत्र ने आज़ादी के यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी। वीर मंगल पांडे के पवित्र प्राण-हव्य को पाकर स्वातंत्र्य यज्ञ की लपटें भड़क उठीं। क्रांति की ये लपलपाती हुई लपटें फिरंगियों को लील जाने के लिए चारों ओर फैलने लगीं।

Tuesday, 14 November 2017

रतन टाटा की जीवनी ratan tata biography

रतन टाटा की जीवनी ratan tata biography

रतन टाटा की जीवनी Ratan Tata Biography in Hindi

रतन टाटा की जीवनी Ratan Tata Biography in Hindi

रतन टाटा भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में से एक हैं। रतन टाटा हजारों लाखों लोगों के लिए आदर्श है इन्होंने अपने जीवन में कड़े संघर्ष मेहनत की बदौलत यह मुकाम हासिल किया है। रतन टाटा ने 1991 में टाटा ग्रुप के अध्यक्ष बने थे और 28 दिसंबर 2012 में रतन टाटा ने टाटा ग्रुप की अध्यक्षता से इस्तीफा दे दिया था। हालांकि रतन टाटा अभी भी टाटा ग्रुप के ट्रस्ट के अध्यक्ष बने हैं। रतन टाटा, टाटा ग्रुप के अलावा टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, टाटा पावर, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, टाटा टी, टाटा केमिकल्स, इंडियन होटल्स और टाटा टेलीसर्विसेज के अध्यक्ष भी रहे हैं। रतन टाटा ने अपनी अगुवाई में टाटा ग्रुप को नई बुलंदियों पर पहुंचाने का काम किया है।

रतन टाटा का शुरुआती जीवन –


रतन टाटा का जन्म 28 दिसंबर 1935 में सूरत शहर में हुआ था। 1940 के दशक में जब रतन टाटा के माता-पिता (सोनू और नवल) एक दूसरे से अलग हुए उस समय रतन टाटा 10 साल के और उनका छोटा भाई जिमी सिर्फ 7 साल का था। इसके बाद इन दोनों भाइयों का पालन पोषण इनकी दादी नवजबाई टाटा ने किया था। मुंबई के कैंपियन स्कूल से रतन टाटा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की उसके बाद कैथेड्रल एंड जॉन कॉनन से इन्होंने अपनी माध्यमिक शिक्षा पूरी की फिर इन्होंने स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग के साथ कॉर्नेल विश्वविद्यालय से 1962 में स्नातक की डिग्री ली। इन सबके बाद रतन टाटा ने हार्वर्ड बिजनेस स्कूल से 1975 में एडवांस मैनेजमेंट प्रोग्राम भी पूरा किया।

रतन टाटा का कैरियर –


भारत वापस आने से पहले रतन टाटा लॉस एंजिल्स, कैलिफोर्निया में जोन्स और एमोंस में थोड़े समय काम किया। रतन टाटा ने अपने करियर की शुरुआत टाटा ग्रुप से की थी, टाटा ग्रुप से रतन टाटा 1961 में जुड़े थे। रतन टाटा, टाटा ग्रुप की कई कंपनियों में अपना सहयोग दे चुके थे उसके बाद 1971 में इन्हें राष्ट्रीय रेडियो और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी (नेल्को) में प्रभारी निदेशक का कार्य भार सौंपा गया। इसके बाद 1981 में रतन टाटा, टाटा इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष बने। 1991 में जेआरडी टाटा ने अपने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने का फैसला लिया और रतन टाटा को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। रतन टाटा ने अपनी प्रतिभा के दम पर टाटा ग्रुप को नई बुलंदियों पर पहुंच दिया। रतन टाटा की अध्यक्षता में टाटा मोटर्स ने अपनी पहली भारतीय कार टाटा इंडिका लॉन्च की जो काफी सफल भी रही।<
इसके बाद टाटा टी ने टेटली, टाटा मोटर्स ने ‘जैगुआर लैंड रोवर’ और टाटा स्टील ने ‘कोरस’ को टेक ओवर कर भारतीय बाजार में तहलका मचा दिया। दुनिया की सबसे सस्ती कार बनाने का आईडिया भी रतन टाटा का ही था। हालाँकि बाद में इन्होंने 28 दिसंबर 2012 को टाटा समूह के सभी कार्यकारी जिम्मेदारियों से सेवानिवृत्त हो गए थे और उनकी जगह 44 वर्षीय साइरस मिस्त्री को दी गई। टाटा समूह से अपने कार्यों से निवृत होने वाले रतन टाटा ने हाल ही में ईकॉमर्स कंपनी स्नैपडील, अर्बन लैडर और चाइनीज़ मोबाइल कंपनी जिओमी में भी निवेश किया है। अभी रतन टाटा प्रधानमंत्री व्यापार और उद्योग परिषद और राष्ट्रीय विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता परिषद के अध्यक्ष के तौर पर नियुक्त हैं।
अब्राहम लिंकन की जीवनी Abraham Lincoln Biography

अब्राहम लिंकन की जीवनी Abraham Lincoln Biography

अब्राहम लिंकन की जीवनी Abraham Lincoln Biography

अब्राहम लिंकन की जीवनी Abraham Lincoln Biography
अमेरिका के 16 वाँ राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का जन्म 12 फरवरी, 1809 को केंटकी (अमेरिका) में हुआ था। उनका पूरा नाम अब्राहम थॉमस लिंकन था उनके पिता एक किसान थे। वह एक साल तक भी स्कूल नहीं गए लेकिन खुद ही पढ़ना लिखना सिखा और वकील बने। एक सफल वकील बनने से पहले उन्होंने विभिन्न प्रकार की नौकरियों की और धीरे – धीरे राजनीति की ओर मुड़े।
उस समय देश में गुलामी की प्रथा की समस्याओं चल रही थी। गोरे लोग दक्षिणी राज्यों के बड़े खेतों के स्वामी थे, और वह अफ्रीका से काले लोगो को अपने खेत में काम करने के लिए बुलाते थे और उन्हें दास के रूप में रखा जाता था। उत्तरी राज्यों के लोग गुलामी की इस प्रथा के खिलाफ थे और इसे समाप्त करना चाहते हैं अमेरिका का संविधान आदमी की समानता पर आधारित है। इस मुश्किल समय में, अब्राहम लिंकन 1860 में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे।


वह गुलामी की समस्या को हल करना चाहते थे। दक्षिणी राज्यों के लोग गुलामी के उन्मूलन के खिलाफ थे। इससे देश की एकता में खतरे आ सकता है। दक्षिणी राज्य एक नए देश बनाने की तैयार कर रहा था। परन्तु अब्राहम लिंकन चाहता था की सभी राज्यों एकजुट हो कर रहे। अब्राहम लिंकन को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। वह किसी भी कीमत पर देश की एकता की रक्षा करना चाहते थे।
अंत में उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के बीच एक नागरिक युद्ध छिड़ गया। उन्होंने युद्ध बहादुरी से लड़ा और घोषणा की, ‘एक राष्ट्र आधा दास और आधा बिना दास नहीं रह सकता” वह युद्ध जीत गए और देश एकजुट रहा। 4 मार्च 1865 को अब्राहम लिंकन इनका दुसरी बार शपथ समारोह हुआ। शपथ समारोह होने के बाद लिंकन इन्होंने किया हुआ भाषण बहुत मशहूर हुआ। उस भाषण से बहुत लोगो के आख मे आसु आ गये। वह किसी के भी खिलाफ नहीं थे और चाहते थे की सब लोग शांति से जीवन बिताये।


1862 में लिंकन की घोषणा की थी अब सभी दास मुक्त होगे।। इसी से ही लिंकन लोगो के बीच लोकप्रिय रहा। अपनी जिंदगी मे कई बार असफलताओ का सामना करने वाले अब्राहम लिंकन आख़िरकार अमेरिका के एक सफल राष्ट्रपति बने थे। वे संयुक्त राज्य अमेरिका के ऐसे महापुरुष थे, जिन्होंने देश और समाज की भलाई के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया। लिंकन कभी भी धर्म के बारे में चर्चा नहीं करते थे और किसी चर्च से सम्बद्ध नहीं थे। एक बार उनके किसी मित्र ने उनसे उनके धार्मिक विचार के बारे में पूछा।
लिंकन ने कहा – “बहुत पहले मैं इंडियाना में एक बूढ़े आदमी से मिला जो यह कहता था ‘जब मैं कुछ अच्छा करता हूँ तो अच्छा अनुभव करता हूँ और जब बुरा करता हूँ तो बुरा अनुभव करता हूँ’। यही मेरा धर्म है”।

अब्राहम लिंकन की मृत्यु -


14 अप्रैल 1865 को वॉशिंग्टन के एक नाट्यशाला मे नाटक देख रहे थे तभी ज़ॉन विल्किज बुथ नाम के युवक ने उनको गोली मारी। इस घटना के बाद दुसरे दिन मतलब 15 अप्रैल के सुबह अब्राहम लिंकन की मौत हुयी।
एक बार लिंकन और उनके एक सहयोगी वकील ने एक बार किसी मानसिक रोगी महिला की जमीन पर कब्जा करने वाले एक धूर्त आदमी को अदालत से सजा दिलवाई। मामला अदालत में केवल पंद्रह मिनट ही चला। सहयोगी वकील ने जीतने के बाद फीस में बँटवारकन ने उसे डपट दिया। सहयोगी वकील ने कहा कि उस महिला के भाई ने पूरी फीस चुका दी थी और सभी अदालत के निर्णय से प्रसन्न थे परन्तु लिंकन ने कहा – “लेकिन मैं खुश नहीं हूँ। वह पैसा एक बेचारी रोगी महिला का है और मैं ऐसा पैसा लेने के बजाय भूखे मरना पसंद करूँगा। तुम मेरी फीस की रकम उसे वापस कर दो।”
मदर टेरेसा की जीवनी Mother Teresa Biography

मदर टेरेसा की जीवनी Mother Teresa Biography

मदर टेरेसा की जीवनी Mother Teresa Biography

मदर टेरेसा की जीवनी Mother Teresa Biography

तमाम जीवन परोपकार और दूसरों की सेवा में अर्पित करने वाली मदर टेरेसा ऐसे महान लोगों में से एक हैं जो सिर्फ दूसरों के लिए जीती थीं। संसार के तमाम दीन-दरिद्र, बीमार, असहाय और गरीबों के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित करने वाली मदर टेरेसा का असली नाम ‘अगनेस गोंझा बोयाजिजू’था।

मदर टेरेसा का जन्म -


अलबेनियन भाषा में गोंझा का अर्थ फूल की कली होता है। मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त, 1910 को स्कॉप्जे (अब मसेदोनिया में) में एक अल्बेनीयाई परिवार में हुआ। उनके पिता निकोला बोयाजू एक साधारण व्यवसायी थे।

मदर टेरेसा के पिता का निधन -

जब वह मात्र आठ साल की थीं तभी उनके पिता परलोक सिधार गए, जिसके बाद उनके लालन-पालन की सारी जिम्मेदारी उनकी माता द्राना बोयाजू के ऊपर आ गयी। वह पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं।
समाजसेवी मदर टेरेसा -
18 साल की उम्र में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ़ लोरेटो’ में शामिल होने का फैसला लिया और फिर वह आयरलैंड चली गयीं जहाँ उन्होंने अंग्रेजी भाषा सीखी क्योंकि ‘लोरेटो’की सिस्टर्स के लिए ये जरुरी था। आयरलैंड से 6 जनवरी, 1929 को वह कोलकाता में ‘लोरेटो कॉन्वेंट पंहुचीं। 1944 में वह सेंट मैरी स्कूल की प्रधानाचार्या बन गईं।

एक कैथोलिक नन -


मदर टेरसा रोमन कैथोलिक नन थीं। मदर टेरेसा ने ‘निर्मल हृदय’ और ‘निर्मला शिशु भवन’के नाम से आश्रम खोले, जिनमें वे असाध्य बीमारी से पीड़ित रोगियों व ग़रीबों की स्वयं सेवा करती थीं। 1946 में गरीबों, असहायों, बीमारों और लाचारों के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। 1948 में स्वेच्छा से उन्होंने भारतीय नागरिकता ले ली थी।

मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी की स्थापना -

7 अक्टूबर 1950 को उन्हें वैटिकन से ‘मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी’की स्थापना की अनुमति मिल गयी। इस संस्था का उद्देश्य समाज से बेखर और बीमार गरीब लोगों की सहायता करना था। मदर टेरेसा को उनकी सेवाओं के लिए विविध पुरस्कारों एवं सम्मानों से सम्मनित किया गया था।

पद्मश्री से सम्मनित -

भारत सरकार ने उन्हें 1962 में पद्मश्री से सम्मनित किया। इन्हें 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार और 1980 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया। मदर टेरेसा ने नोबेल पुरस्कार की 192,000 डॉलर की धन-राशि गरीबों को फंड कर दी। 1985 में अमेरिका ने उन्हें मेडल आफ़ फ्रीडम से नवाजा।

अंतिम समय में रहीं परेशान -

अपने जीवन के अंतिम समय में मदर टेरेसा ने शारीरिक कष्ट के साथ-साथ मानसिक कष्ट भी झेले क्योंकि उनके ऊपर कई तरह के आरोप लगाए गए थे। उन पर ग़रीबों की सेवा करने के बदले उनका धर्म बदलवाकर ईसाई बनाने का आरोप लगा। भारत में भी पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में उनकी निंदा हुई। उन्हें ईसाई धर्म का प्रचारक माना जाता था।

मदर टेरेसा का निधन -



मदर टेरेसा की बढती उम्र के साथ-साथ उनका स्वास्थ्य भी गिरता चला गया। 1983 में पॉप जॉन पॉल द्वितीय से मिलने के दौरान उन्हें पहली बार दिल का दौरा पड़ा। 1989 में उन्हें दूसरा दिल का दौरा पड़ा और उन्हें कृत्रिम पेसमेकर लगाया गया।
उनका निधन -
उनका निधन साल 1991 में मैक्सिको में उन्हें न्यूमोनिया और ह्रदय की परेशानी हो गयी। 13 मार्च 1997 को उन्होंने ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ के मुखिया का पद छोड़ दिया और 5 सितम्बर, 1997 को उनकी मौत हो गई।
मिल्खा सिंह की जीवनी Milkha Singh Biography

मिल्खा सिंह की जीवनी Milkha Singh Biography

मिल्खा सिंह की जीवनी : Milkha Singh Biography In Hindi


मिल्खा सिंह की जीवनी Milkha Singh Biography In Hindi

मिल्खा सिंह का जन्म पाकिस्तान के लायलपुर में 8 अक्टूबर, 1935 को हुआ था। उन्होंने अपने माता-पिता को भारत-पाक विभाजन के समय हुए दंगों में खो दिया था। वह भारत उस ट्रेन से आए थे जो पाकिस्तान का बॉर्डर पार करके शरणार्थियों को भारत लाई थी। अत: परिवार के नाम पर उनकी सहायता के लिए उनके बड़े भाई-बहन थे। मिल्खा सिंह का नाम सुर्ख़ियों में तब आया जब उन्होंने कटक में हुए राष्ट्रीय खेलों में 200 तथा 400 मीटर में रिकॉर्ड तोड़ दिए।

1958 में ही उन्होंने टोकियो में हुए एशियाई खेलों में 200 तथा 400 मीटर में एशियाई रिकॉर्ड तोड़ते हुए स्वर्ण पदक जीते। इसी वर्ष अर्थात 1958 में कार्डिफ (ब्रिटेन) में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भी स्वर्ण पदक जीता। उनकी इन्हीं सफलताओं के कारण 1958 में भारत सरकार द्वारा उन्हें ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया। मिल्खा सिंह का नाम ‘फ़्लाइंग सिख’ पड़ने का भी एक कारण था। वह तब लाहौर में भारत-पाक प्रतियोगीता में दौड़ रहे थे। वह एशिया के प्रतिष्ठित धावक पाकिस्तान के अब्दुल खालिक को 200 मीटर में पछाड़ते हुए तेज़ी से आगे निकल गए, तब लोगों ने कहा- ”मिल्खा सिंह दौड़ नहीं रहे थे, उड़ रहे थे।” बस उनका नाम ‘फ़्लाइंग सिख’ पड़ गया।

मिल्खा सिंह के बारे में




मिल्खा सिंह ने अनेक बार अपनी खेल योग्यता सिद्ध की। उन्होंने 1968 के रोम ओलंपिक में 400 मीटर दौड़ में ओलंपिक रिकॉर्ड तोड़ दिया। उन्होंने ओलंपिक के पिछले 59 सेकंड का रिकॉर्ड तोड़ते हुए दौड़ पूरी की। उनकी इस उपलब्धि को पंजाब में परी-कथा की भांति याद किया जाता है और यह पंजाब की समृद्ध विरासत का हिस्सा बन चुकी है। इस वक्त अनेक ओलंपिक खिलाड़ियों ने रिकॉर्ड तोड़ा था। उनके साथ विश्व के श्रेष्ठतम एथलीट हिस्सा ले रहे थे। 1960 में रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर दौड़ की प्रथम हीट में द्वितीय स्थान (47.6 सेकंड) पाया था। 

फिर सेमी फाइनल में 45.90 सेकंड का समय निकालकर अमेरिकी खिलाड़ी को हराकर द्वितीय स्थान पाया था। फाइनल में वह सबसे आगे दौड़ रहे थे। उन्होंने देखा कि सभी खिलाड़ी काफी पीछे हैं अत: उन्होंने अपनी गति थोड़ी धीमी कर दी। परन्तु दूसरे खिलाड़ी गति बढ़ाते हुए उनसे आगे निकल गए। अब उन्होंने पूरा जोर लगाया, परन्तु उन खिलाड़ियों से आगे नहीं निकल सके। अमेरिकी खिलाड़ी ओटिस डेविस और कॉफमैन ने 44.8 सेकंड का समय निकाल कर प्रथम व द्वितीय स्थान प्राप्त किया। दक्षिण अफ्रीका के मैल स्पेन्स ने 45.4 सेकंड में दौड़ पूरी कर तृतीय स्थान प्राप्त किया। मिल्खा सिंह ने 45.6 सेकंड का समय निकाल कर मात्र 0.1 सेकंड से कांस्य पदक पाने का मौका खो दिया।


मिल्खा सिंह को बाद में अहसास हुआ कि गति को शुरू में कम करना घातक सिद्ध हुआ। विश्व के महान एथलीटों के साथ प्रतिस्पर्धा में वह पदक पाने से चूक गए। मिल्खा सिंह ने खेलों में उस समय सफलता प्राप्त की जब खिलाड़ियों के लिए कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं, न ही उनके लिए किसी ट्रेनिंग की व्यवस्था थी। आज इतने वर्षों बाद भी कोई एथलीट ओलंपिक में पदक पाने में कामयाब नहीं हो सका है। रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह इतने लोकप्रिय हो गए थे कि जब वह स्टेडियम में घुसते थे, दर्शक उनका जोशपूर्वक स्वागत करते थे। 

यद्यपि वहाँ वह टॉप के खिलाड़ी नहीं थे, परन्तु सर्वश्रेष्ठ धावकों में उनका नाम अवश्य था। उनकी लोकप्रियता का दूसरा कारण उनकी बढ़ी हुई दाढ़ी व लंबे बाल थे। लोग उस वक्त सिख धर्म के बारे में अधिक नहीं जानते थे। अत: लोगों को लगता था कि कोई साधु इतनी अच्छी दौड़ लगा रहा है। उस वक्त ‘पटखा’ का चलन भी नहीं था, अत: सिख सिर पर रूमाल बाँध लेते थे। मिल्खा सिंह की लोकप्रियता का एक अन्य कारण यह था कि रोम पहुंचने के पूर्व वह यूरोप के टूर में अनेक बड़े खिलाडियों को हरा चुके थे और उनके रोम पहुँचने के पूर्व उनकी लोकप्रियता की चर्चा वहाँ पहुंच चुकी थी।


मिल्खा सिंह के जीवन में दो घटनाए बहुत महत्व रखती हैं। प्रथम-भारत-पाक विभाजन की घटना जिसमें उनके माता-पिता का कत्ल हो गया तथा अन्य रिश्तेदारों को भी खोना पड़ा। दूसरी-रोम ओलंपिक की घटना, जिसमें वह पदक पाने से चूक गए। इसी प्रथम घटना के कारण जब मिल्खा सिंह को पाकिस्तान में दौड़ प्रतियोगिता में भाग लेने का आमंत्रण मिल्खा तो वह विशेष उत्साहित नहीं हुए। लेकिन उन्हें एशिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के साथ दौड़ने के लिए मनाया गया।

 उस वक्त पाकिस्तान का सर्वश्रेष्ठ धावक अब्दुल खादिक था जो अनेक एशियाई प्रतियोगिताओं में 200 मीटर की दौड़ जीत चुका था। ज्यों ही 200 मीटर की दौड़ शुरू हुई यूं लगा कि मानो मिल्खा सिंह दौड़ नहीं, उड़ रहें हों। उन्होंने अब्दुल खादिक को बहुत पीछे छोड़ दिया। लोग उनकी दौड़ को आश्चर्यचकित होकर देख रहे थे। तभी यह घोषणा की गई कि मिल्खा सिंह दौड़ने के स्थान पर उड़ रहे थे और मिल्खा सिंह को ‘फ़्लाइंग सिख’ कहा जाने लगा। उस दौड़ के वक्त पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अय्यूब भी मौजूद थे।

 इस दौड़ में जीत के पश्चात् मिल्खा सिंह को राष्ट्रपति से मिलने के लिए वि.आई.पी. गैलरी में ले जाया गया। मिल्खा सिंह द्वारा जीती गई ट्राफियां, पदक, उनके जूते (जिन्हें पहन कर उन्होंने विश्व रिकार्ड तोड़ा था), ब्लेजर यूनीफार्म उन्होंने जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में बने राष्ट्रीय खेल संग्रहालय को दान में दे दिए थे। 1962 में एशियाई खेलों में मिल्खा सिंह ने स्वर्ण पदक जीता। खेलों से रिटायरमेंट के पश्चात् वह इस समय पंजाब में खेल, युवा तथा शिक्षा विभाग में अतिरिक्त खेल निदेशक के पद पर कार्यरत हैं।


उनका विवाह पूर्व अन्तरराष्ट्रीय खिलाड़ी निर्मल से हुआ था। मिल्खा सिंह के एक पुत्र तथा तीन पुत्रियां है। उनका पुत्र चिरंजीव मिल्खा सिंह (जीव मिल्खा सिंह भी कहा जाता है) भारत के टॉप गोल्फ खिलाड़ियों में से एक है तथा राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेकों पुरस्कार जीत चुका है। उसने 1990 में बीजिंग के एशियाई खेलों में भी भाग लिया था। मिल्खा सिंह की तीव्र इच्छा है कि कोई भारतीय एथलीट ओलंपिक पदक जीते, जो पदक वह अपनी छोटी-सी गलती के कारण जीतने से चूक गए थे।


 मिल्खा सिंह चाहते हैं कि वह अपने पद से रिटायर होने के पश्चात् एक एथलेटिक अकादमी चंडीगढ़ या आसपास खोलें ताकि वह देश के लिए श्रेष्ठ एथलीट तैयार कर सकें। मिल्खा सिंह अपनी लौह इच्छा शक्ति के दम पर ही उस स्थान पर पहुँच सके, जहाँ आज कोई भी खिलाड़ी बिना औपचारिक ट्रेनिंग के नहीं पहुँच सका।

उपलब्धियां -

  • 1957 में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर में 47.5 सेकंड का नया रिकॉर्ड बनाया।
  • टोकियो जापान में हुए तीसरे एशियाड (1958) में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर तथा 200 मीटर में दो नए रिकॉर्ड स्थापित किए।
  • जकार्ता (इंडोनेशिया) में हुए चौथे एशियाड (1959) में उन्होंने 400 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीता।
  • 1959 में भारत सरकार ने उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया।
  • 1960 में रोम ओलंपिक में उन्होंने 400 मीटर दौड़ का रिकॉर्ड तोड़ा।
  • 1962 के एशियाई खेलों में मिल्खा सिंह ने स्वर्ण पदक जीता।
विक्की रॉय की जीवनी Vicky Roy Biography In Hindi

विक्की रॉय की जीवनी Vicky Roy Biography In Hindi

विक्की रॉय की जीवनी : Vicky Roy Biography In Hindi

विक्की रॉय की जीवनी

क्या हम सोच सकते है कि गरीबी के कारण 11 वर्ष की उम्र में घर से भागने वाला लड़का जो दिल्ली जाकर रेलवे स्टेशन पर जाकर कचरा बीनने लगा वह एक अन्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फोटोग्राफर बन सकता है? पढ़िए हजारों लोगो के प्रेरणास्त्रोत 27 वर्षीय मशहूर फोटोग्राफर विक्की रॉय की गरीबी, संघर्ष और सफलता की कहानी।

विक्की रॉय 11 वर्ष की उम्र में घर से भागना –


पुरुलिया गांव (पश्चिम बंगाल) में बहुत ही गरीब परिवार में जन्मे विक्की रॉय (Vicky Roy) जब छोटे थे तो उनके माता पिता ने गरीबी के कारण विक्की को उनके नाना-नानी के घर छोड़ दिया था। नाना नानी के घर में विक्की के साथ अत्याचार होता था। वहां पर विकी को दिन भर काम करना पड़ता और छोटी-छोटी बातों के लिए उनके साथ मार-पीट होती थी। नाना-नानी के घर में विकी एक कैदी के समान हो गए थे जबकि विक्की को घुमने फिरने शौक था। इसलिए 1999 में मात्रा 11 वर्ष की आयु में विक्की ने अपने मामा की जेब से 900 रूपये चोरी किये और घर से भाग गए। घर छोड़ने के बाद विक्की दिल्ली पहुँच गए।
विक्की जब छोटे से गाँव से भागकर दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचे तो शहर की भीड़भाड़ देखकर वे घबरा गए और रोने लगे। तभी उनकी मुलाकात रेलवे स्टेशन पर रहने वाले कुछ लड़कों से हुयी जो वहां पर कचरा बीनने का काम करते थे। विक्की दिन भर उन लड़कों के साथ रहते और रेलवे स्टेशन से खाली बोतलें बीनकर, उसमें पानी भर कर रेल के जनरल डब्बों में बेचते। रात को वे रेलवे स्टेशन पर सोते थे लेकिन रात में जब पुलिस वाले मुआइना करने के लिए आते तो डंडा मारकर भगा देते थे। कुछ दिनों बाद कुछ व्यक्ति, विक्की को अनाथालय (शेल्टर होम) गए। विक्की अनाथालय में रहने लगे और वहां पर उन्हें अच्छा खाना-पीना मिल जाता था।

लेकिन शेल्टर होम पर हमेशा ताला लगा रहता था और कोई भी वहां से बाहर नहीं जा सकता था। विक्की फिर से एक कैदी की तरह हो गए थे, इसलिए उन्होंने अनाथालय से भागने का फैसला किया। एक दिन मौका देखकर वह अनाथालय से भाग गए और फिर से रेलवे स्टेशन जाकर वही कचरा बीनने का काम करने लगे। लेकिन पैसों की कमी के कारण कुछ महीनों बाद वह अजमेरी गेट के किसी सड़क किनारे बने रेस्तरां में, बर्तन धोने का काम करने लगे। यह समय विक्की के लिए सबसे मुश्किल समय था। कड़ाके की ठण्ड में विक्की को सुबह पांच बजे उठा दिया जाता और वे रात को 12 बजे तक ठन्डे पानी से बर्तन धोते।

              
एक बार उसी रेस्तरां में एक सज्जन व्यक्ति खाना खाने आये। उन्होंने जब विक्की को काम करते देखा, तो उन्होंने कहा कि तुम्हारी पढने-लिखने की उम्र है, पैसे कमाने की नहीं और वे विक्की को सलाम बालक ट्रस्ट नामक संस्था में ले आए। सलाम बालक ट्रस्ट की “अपना घर” संस्था में विक्की रहने लग गए। 2000 में, उनका दाखिल 6th क्लास में करा दिया गया और वे निरंतर रूप से स्कूल जाने लगे। लेकिन 10 th क्लास में उनके, मात्रा 48 % ही आये, इस कारण उन्होंने कुछ और करने का निर्णय लिया।

   ➤ BEGINNING AS A PHOTOGRAPHER                                

2004 में विक्की ने अपने टीचर को फोटोग्राफी क्षेत्र में अपनी रूचि के बारे में बताया। उसी समय ट्रस्ट के अंदर ही एक फोटोग्राफी वर्कशॉप का आयोजन हो रहा था, जिसके लिए ब्रिटिश फोटोग्राफर डिक्सी बेंजामिन आये हुए थे। तो टीचर ने डिक्सी बेंजामिन से विक्की का परिचय करवाया और कहा कि यह एक फोटोग्राफर बनना चाहता है। डिक्सी ने विक्की को थोड़ी-बहुत फोटोग्राफी सिखाई, लेकिन विक्की को उनके साथ काम करने में परेशानी हुई, क्योकि विक्की को इंग्लिश नहीं आती थी। कुछ ही समय बाद डिक्सी वापस विदेश लौट गए। इसके बाद विक्की को दिल्ली के एक फोटोग्राफर, एनी मान से सीखने का मौका मिला। एनी उन्हें 3000 रुपये, तनख़्वाह के रूप में और मोबाइल और बाइक के लिए पैसे देते थे। 18 साल की उम्र तक तो विक्की सलाम बालक ट्रस्ट में रहें, लेकिन इसके बाद उन्हें किराये पर मकान लेकर रहना पड़ा। इसी समय उन्होंने सलाम बालक ट्रस्ट से, B/W Nikon camera खरीदने के लिए लोन लिया। इसके लिए उन्हें हर महीने, Rs 500 किस्त के रूप में और Rs 2,500 मकान का किराया भी देना होता था। इस कारण विक्की को बड़े-बड़े होटलों में वेटर का काम करना पड़ता था, जिससे उन्होंने रोजाना Rs 250 मिल जाते थे।


   ➤RAG-PICKER TURNED PHOTOGRAPHER                      

2007 में जब विक्की 20 वर्ष के हो गए तो उन्होंने अपनी फोटोग्राफी की पहली प्रदर्शनी लगाई। इसका नाम था ‘Street Dreams’ और उन्होंने यह प्रदर्शनी India Habitat centre में लगाई। इससे उन्हें बहुत ख्याति मिली। इसके बाद में वे लंदन, वियतनाम और दक्षिण अफ्रीका भी गए। 2008 में विक्की तीन अन्य फोटोग्राफर के साथ राम चंद्र नाथ फाउंडेशन द्वारा नामित, मायबच फाउंडेशन के लिए फोटोग्राफी करने न्यूयॉर्क भी गए। 2009 की शुरुआत में छह महीने के लिए, विक्की ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के पुनर्निर्माण की फोटोग्राफी का अध्ययन किया। वापस भारत आने के बाद, विक्की को सलाम बालक ट्रस्ट ने International Award for Young people सम्मानित किया।

  ➤SUCCESS & AWARDS                                                             

इसके बाद विक्की को और भी कई सम्मान से नवाज़ गया। 2010 में, विक्की को Bahrain Indian ladies association ने young achiever from India से भी सम्मानित किया। 2011 में विक्की और उनके दोस्त Chandan Gomes ने फोटोग्राफी लाइब्रेरी बनाई और कई अन्य प्रसिद्ध फोटोग्राफर से भी इससे जुड़ने आग्रह किया, ताकि जो लोग पैसों की तंगी की वजह से फोटोग्राफी सम्बंधित किताबें नहीं खरीद नहीं पाते, उनकी सहायता की जा सकें। अब इस लाइब्रेरी में 500 किताबें है और विक्की समय-समय पर वर्कशॉप भी करवाते हैं। 2013 में विक्की का चयन आठ अन्य फोटोग्राफर के साथ Nat Geo Mission के Cover shoot के लिए हुआ और वो श्रीलंका गए। इसी साल उन्होंने अपनी पहली किताब ‘Home Street Home’ लिखी, जिसे Nazar Foundation ने प्रकाशित किया। इसका दूसरा भाग, 2013 में ही Delhi Photo Festival में प्रकाशित हुआ। इन्हें 2014 में, Boston MIT और Ink Talk में एक महीनें के लिए fellowship भी मिली। कई सालों के बाद विक्की अपने भाई- बहनों से भी मिले। अब वह अपने परिवार की देखरेख भी करते हैं। अब वह freelance photographer के रूप में काम करते हैं।


विक्की बताते हैं –अगर आप अपने जीवन में कुछ करना चाहते हैं तो आपको हमेशा कड़ी मेहनत करनी होगी, सफल होने के लिए कोई भी शोर्टकट नहीं होता। अगर आप अपने सपनों को साकार करना चाहते हैं तो उसी पर अपनी नज़र रखें। बाधाओं से डर कर भागने से, आप कभी सफल नहीं हो पाएंगे।
अमिताभ बच्चन की जीवनी Amitabh Bachchan Biography

अमिताभ बच्चन की जीवनी Amitabh Bachchan Biography

अमिताभ बच्चन की जीवनी : Amitabh Bachchan Biography in Hindi

हिंदी फिल्म जगत के शहंशाह अमिताभ बच्चन भारत के सबसे सफल, लोकप्रियता तथा ज्यादा समय तक ‘सुपर स्टार’ (अब ‘मेगास्टार’) रहने का गौरव पाने वाले अभिनेता हैं। उन्हें बेशुमार सफलताओं के कारण ‘वन मैन इंडस्ट्री’ कहा जाता है। लाखोँ दिलो की धड़कन, उनके चाहनेवालो के भगवान्, और महानायक Amitabh Bachchan की संशिप्त जानकारी।


अमिताभ बच्चन की जीवनी

मशहूर लेखक-निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास ने उन्हें अपनी फिल्म ‘सात हिंदुस्थानी’ (1969) में ब्रेक दिया। इसके बाद उन्हें ‘आनंद’ (1970) व ‘नमक हरम’ (1973) में उस दौर के सुपर स्टार राजेश खन्ना के साथ उत्कृष्ट अभिनय करने के लिए पहचाना गया, लेकिन ‘जंजीर’ (1973) से उन्हें ‘एंग्री यंग मैन’ की ऐतिहासिक इमेज मिली। ‘आनंद’ में राजेश खन्ना एवं ‘शक्ति’ (1982) में दिलीप कुमार के साथ अपनी श्रेष्ठता सिध्द कर उन्होंने हिंदी सिनेमा पर अपना एकछत्र साम्राज्य स्थापित कर लिया। अपने समय की प्रख्यात अभिनेत्री जया भादुड़ी उनकी पत्नी हैं।


अमिताभ बच्चन को ‘फिल्म फेयर पुरस्कार’, राष्ट्रीय पुरस्कार, ‘पदमश्री’ आदि सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उन पर बी.बी.सी. ने एक विशेष वृत्तचित्र भी बनाया है। साथ ही विश्व स्तर पर सर्वेक्षण से प्राप्त निष्कर्ष के आधार पर अमिताभ को ‘मिलेनियम ऑफ दि स्टार’ से भी सुशोभित किया है। वह सन 1985 में इलाहाबाद से लोक सभा के लिए चुने गए थे।

अमिताभ बच्चन की सबसे सफल फ़िल्में : Amitabh Bachchan Hit Movies

  • ‘आनंद’ (1970)
  • ‘नमक हराम’ (1973)
  • ‘अभिमान’ (1975)
  • ‘मिली’ (1970)
  • ‘दीवार’
  • ‘शोले’ (1975)
  • ‘अमर अकबर एंथोनी’ (1977)
  • ‘मुकद्दर का सिकंदर’ (1978)
  • ‘त्रिशूल’ (1978)
  • ‘सिलसिला’ (1981)
  • ‘शक्ति’ (1982)
  • ‘अग्निपथ’ (1990) आदि।



एक लंबे विराम के बाद अमिताभ की सिने-स्क्रीन पर फिर से वापसी हुई है। ‘अमिताभ बच्चन कपेरिशन लि. (ABCL) के नाम से उन्होंने एक कंपनी की स्थापना की है, जिसका उद्देश्य फिल्मों के वितरण के साथ ही सांस्कृतिक एवं संगीत संबंधी कार्यक्रम करना भी है। बंगलोर में आयोजित ‘द मिस वर्ल्ड ब्यूटी पेजेन्ट 96’ को भी इस कंपनी ने स्पोन्सर किया था।

अमिताभ बच्चन पुरस्कार Amitabh Bachchan Awards List

  1.  पद्म भूषण
  2. फिल्म फेयर पुरस्कार
  3. राष्ट्रीय पुरस्कार
  4. पदमश्री
आदित्यनाथ योगी का जीवन परिचय Yogi Adityanath Biography

आदित्यनाथ योगी का जीवन परिचय Yogi Adityanath Biography


आदित्यनाथ योगी का जीवन परिचय Yogi Adityanath Biography in Hindi

आदित्यनाथ योगी का जीवन परिचय : आदित्यनाथ एक भारतीय पुजारी और हिंदू राष्ट्रवादी राजनीतिज्ञ हैं, जो 26 मार्च 2017 से उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री हैं। योगी आदित्यनाथ की एक छवि हिंदुत्व फायरब्रांड के रूप में है।

योगी आदित्यनाथ गोरखपुर विधानसभा से 1998 के बाद से संसद सदस्य रहे हैं। वह गोरखनाथ मठ के मुख्य पुजारी भी हैं। योगी आदित्यनाथ ने हिंदू युवा वाहिनी, युवा संगठन की स्थापना की, जो सांप्रदायिक हिंसा में शामिल होने के लिए जाना जाता है।

योगी आदित्यनाथ प्रारंभिक जीवन और शिक्षा



योगी आदित्यनाथ का जन्म 5 जून 1972 को अजय मोहन बिष्ट के रूप में पंचार गांव में, उत्तर प्रदेश (अब उत्तराखंड) के पौड़ी गढ़वाल में हुआ था। उनके पिता आनंद सिंह बिष्ट वन रेंजर थे। उन्होंने उत्तराखंड में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय से गणित में अपनी स्नातक की डिग्री पूरी की।
अयोध्या राम मंदिर आंदोलन में शामिल होने के लिए उन्होंने 1990 के आसपास अपना घर छोड़ा। वह गोरखनाथ मठ के मुख्य पुजारी महंत अव्यानाथ के प्रभाव में आए और उनके शिष्य बने। इसके बाद, उन्हें ‘योगी आदित्यनाथ’ नाम दिया गया और महंत अव्यानाथ के उत्तराधिकारी के रूप में नामित किया गया। हालांकि गोरखपुर में अपनी स्थापना के बाद आधारित, आदित्यनाथ ने अक्सर अपने पैतृक गांव का दौरा किया, वहां एक स्कूल की स्थापना 1998 में हुई।

आदित्यनाथ योगी का जीवन परिचय : Yogi Adityanath Biography in Hindi



आदित्यनाथ ने 21 वर्ष की आयु में अपने परिवार को त्याग दिया और गोरखनाथ मठ के तत्कालीन महायाजक महंत अव्यानाथ के शिष्य बने। 12 सितंबर 2014 को उनके शिक्षक महंत आवेदनाथ की मृत्यु के बाद उन्हें गोरखनाथ गणित के महंत या महायाजक के पद पर पदोन्नत किया गया था। योगी आदित्यनाथ को 14 सितंबर 2014 को नाथ संप्रदाय के पारंपरिक अनुष्ठानों के बीच गणित के पीताधारीश्वर बनाया गया था।

योगी आदित्यनाथ राजनीति में कैरियर

योगी आदित्यनाथ को 1994 में गोरखनाथ के प्रमुख पुजारी के रूप में नियुक्त किया गया था और चार साल बाद वह भारतीय संसद के निचले सदन के लिए चुने गए थे। वह 12 वीं लोकसभा में सबसे कम उम्र के सदस्य थे। लगातार पांच वर्षों तक, वह गोरखपुर से संसद के लिए चुने गए हैं।

आदित्यनाथ योगी भाजपा के साथ संबंध



प्रारंभ में योगी आदित्यनाथ के पास भाजपा के साथ एक सुसंगत संबंध नहीं था। हालांकि, धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो गया और गोरखपुर में कई भाजपा नेताओं ने उनका दौरा किया। वह मार्च 2010 में भाजपा सांसदों में से एक थे जिन्होंने संसद में महिला आरक्षण विधेयक पर पार्टी कोड़ा को चुनौती दी थी।
योगी आदित्यनाथ, उत्तर प्रदेश के 2017 विधानसभा चुनावों में एक प्रमुख भाजपा प्रचारक थे। मार्च 2017 में, भाजपा ने विधानसभा चुनाव जीता था, वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। सत्ता में आने के बाद, उन्होंने उत्तर प्रदेश के सरकारी कार्यालयों में गाय तस्करी, तम्बाकू, पैन और गुटका पर प्रतिबंध लगा दिया और राज्य में विरोधी-रोमीओ दस्ते बनाए। इसके अलावा उत्तर प्रदेश पुलिस ने 100 से ज्यादा पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया।

मुख्य मंत्री का प्रोफ़ाइल रखने के साथ-साथ वह गृह, आवास, राजस्व, खाद्य और नागरिक आपूर्ति, खाद्य सुरक्षा और दवा प्रशासन, टिकट और रजिस्ट्री, टाउन और देश नियोजन विभाग, अर्थशास्त्र और सांख्यिकी सहित लगभग 36 मंत्रालयों की देखभाल कर रहे हैं।
प्रभास की जीवनी Prabhas Biography

प्रभास की जीवनी Prabhas Biography

प्रभास की जीवनी : Prabhas Biography 


प्रभास की जीवनी : Prabhas Biography

प्रभास का प्रारंभिक जीवन


प्रभास एक भारतीय फिल्म अभिनेता है जो तेलुगू सिनेमा में अपने काम के लिए प्रसिद्ध है। प्रभास जिनका पूरा नाम हैं वेंकट सत्यनारायण प्रभास राजू उप्पालापाटि हैं उनका जन्म फिल्म निर्माता यू. सूर्यनारायण राजू उप्पालापाटि और उनकी पत्नी शिव कुमारी के घर में हुआ था। वह तीनों बच्चों में सबसे छोटा है, एक बड़े भाई प्रमोद उप्पालापाटि और बहन प्रगती के हैं। उनके चाचा तेलगु अभिनेता कृष्णम राजू उप्पालापाटि हैं। प्रभास डीएनआर स्कूल, भीमवरम से बी.टेक के साथ स्नातक हैं और श्री चैतन्य कॉलेज, हैदराबाद से डिग्री ली हैं।

प्रभास कैरियर

प्रभास ने 2002 में ईश्वर के साथ अपना फिल्म कैरियर शुरू किया था। 2003 में, वह राघवेंद्र में मुख्य भूमिका में थे। 2004 में, वह वर्धन में दिखाई दिए उन्होंने अपने कैरियर को “एडवी रामुडू” और “चक्रम” के साथ जारी रखा।
2005 में उन्होंने एस. एस. राजमुली द्वारा निर्देशित फिल्म “छतरपाठी” में अभिनय किया, जिसमें उन्होंने एक शरणार्थी की भूमिका निभाई।

बाद में उन्होंने “पौरनामी”, “योगी” और “मुन्ना” में अभिनय किया, एक एक्शन ड्रामा फिल्म 2007 में आई, उसके बाद 2008 में एक्शन कॉमेडी “बुजजीगाडू” ने अभिनय किया।

2010 में वह रोमांटिक कॉमेडी “डार्लिंग” में और 2011 में, “श्री परफेक्ट”, में दिखाई दिये। 2012 में, प्रभास ने “रिबेल” में अभिनय किया, राघव लॉरेंस द्वारा निर्देशित “एक्शन” फिल्म बादमें उनकी अगली फिल्म मिरची थी।

2015 में वह एस.एस. राजमौली के महाकाव्य बाहुबली: द बिगिन में शिवडू / महेंद्र बाहुबली और अमररेन्द्र बाहुबली के रूप में दिखाई दिए। यह फिल्म भारत भर क्या दुनिया भर में तीसरी सबसे बड़ी कमाई करने वाली फिल्म बन गई है और इस फ़िल्म की दुनिया भर में आलोचकों और व्यावसायिक प्रशंसा की गई है।
28 अप्रैल 2017 को बाहुबली : द बिज़िनिंग की अगली कड़ी, बाहुबली 2: द कॉन्क्लूज़न रिलीज हुईं और उसको आज भी दुनिया भर में पसंद किया गया हैं।

प्रभास की फिल्मों की सूची

  • Eeshwar2002 – (Telugu)
  • Raghavendra 2003 – (Telugu)
  • Adavi Ramudu 2004 – (Telugu)
  • Chatrapathi 2005 – (Telugu)
  • Chakram 2005 – (Telugu)
  • Pournami 2006 – (Telugu)
  • Yogi 2007 – (Telugu)
  • Dhee 2007 – (Telugu)
  • Munna 2007 – (Telugu)
  • Bujjigadu 2008 – (Telugu)
  • Billa 2009 – (Telugu)
  • Darling 2010 – (Telugu)
  • Mr. Perfect2011 – (Telugu)
  • Rebel 2012 – (Telugu)
  • Mirchi 2013 – (Telugu)
  • Baahubali: The Beginning 2015 – (Telugu , Tamil, Hindi)
  • Baahubali 2: The Conclusion2017 – (Telugu , Tamil, Hindi)

Monday, 13 November 2017

सुपरस्टार रजनीकांत की जीवनी

सुपरस्टार रजनीकांत की जीवनी

सुपरस्टार रजनीकांत की जीवनी  Rajinikanth Biography In Hindi

सुपरस्टार रजनीकांत की जीवनी  Rajinikanth Biography In Hindi



रजनीकांत आम लोगों के लिए उम्मीद का प्रतीक| यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि रजनीकांत ऐसे इंसान हें जिन्होंने फर्श से अर्श तक आने की कहावत को सत्य साबित करके बताया हो| दुनिया में ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने बड़ी बड़ी सफलताएं अर्जित की पर जिस तरह रजनीकांत ने अभावों और संघर्षों में इतिहास रचा है वैसा पूरी दुनिया में कम ही लोग कर पाएं होंगे| एक कारपेंटर से कुली बनने, कुली से बी.टी.एस. कंडक्टर और फिर एक कंडक्टर से विश्व के सबसे ज्यादा प्रसिद्ध सुपरस्टार बनने तक का सफ़र कितना परिश्रम भरा होगा ये हम सोच सकते हैं| रजनीकांत का जीवन ही नहीं बल्कि फिल्मी सफ़र भी कई उतार चढ़ावों से भरा रहा है| जिस मुकाम पर आज रजनीकांत काबिज़ हैं उसके लिए जितना परिश्रम और त्याग चाहिए होता है शायद रजनीकांत ने उससे ज्यादा ही किया है|

रजनीकांत जी का संघर्षपूर्ण बचपन –


रजनीकांत का जन्म 12 दिसम्बर 1950 को कर्नाटक के बैंगलोर में एक बेहद मध्यमवर्गीय मराठी परिवार में हुआ था| वे अपने चार भाई बहनों में सबसे छोटे थे| उनका जीवन शुरुआत से ही मुश्किलों भरा रहा, मात्र पांच वर्ष की उम्र में ही उन्होंने अपनी माँ को खो दिया था| पिता पुलिस में एक हवलदार थे और घर की माली स्तिथि ठीक नहीं थी| रजनीकांत ने युवावस्था में कुली के तौर पर अपने काम की शुरुआत की फिर वे ब.टी.एस में बस कंडक्टर (bus conductor) की नौकरी करने लगे|

रजनीकांत का अंदाज़ –


एक कंडक्टर के तौर पर भी उनका अंदाज़ किसी स्टार से कम नहीं था| वो अपनी अलग तरह से टिकट काटने और सीटी मारने की शैली को लेकर यात्रियों और दुसरे बस कंडक्टरों के बीच विख्यात थे| कई मंचों पर नाटक करने के कारण फिल्मों और एक्टिंग के लिए शौक तो हमेशा से ही था और वही शौक धीरे धीरे जुनून में तब्दील हो गया| लिहाज़ा उन्होंने अपना काम छोड़ कर चेन्नई के अद्यार फिल्म इंस्टिट्यूट में दाखिला ले लिया| वहां इंस्टिट्यूट में एक नाटक के दौरान उस समय के मशहूर फिल्म निर्देशक के. बालाचंदर की नज़र रजनीकांत पर पड़ी और वो रजनीकांत से इतना प्रभावित हुए कि वहीँ उन्हें अपनी फिल्म में एक चरित्र निभाने का प्रस्ताव दे डाला| फिल्म का नाम था अपूर्व रागांगल| रजनीकांत की ये पहली फिल्म थी पर किरदार बेहद छोटा होने के कारण उन्हें वो पहचान नहीं मिल पाई, जिसके वे योग्य थे| लेकिन उनकी एक्टिंग की तारीफ़ हर उस इंसान ने की जिसकी नज़र उन पर पड़ी|

रजनीकांत विलेन से हीरो बने –




रजनीकांत का फिल्मी सफ़र भी किसी फिल्म से कम नहीं| उन्होंने परदे पर पहले नकारात्मक चरित्र और विलेन के किरदार से शुरुआत की, फिर साइड रोल किये और आखिरकार एक हीरो के तौर पर अपनी पहचान बनाई| हालांकि रजनीकान्त, निर्देशक के. बालाचंदर को अपना गुरु मानते हैं पर उन्हें पहचान मिली निर्देशक एस.पी मुथुरामन की फिल्म चिलकम्मा चेप्पिंडी से| इसके बाद एस.पी. की ही अगली फिल्म ओरु केल्विकुर्री में वे पहली बार हीरो के तौर पर अवतरित हुए| इसके बाद रजनीकांत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और दर्जनों हिट फिल्मों की लाइन लगा दी| बाशा, मुथू, अन्नामलाई, अरुणाचलम, थालाप्ति उनकी कुछ बेहेतरीन फिल्मों में से एक हैं}| उम्र कोई मायने नहीं रखती –

रजनीकांत ने यह साबित कर दिया की उम्र केवल एक संख्या है और अगर व्यक्ति में कुछ करने की ठान ले तो उम्र कोई मायने नहीं रखती| 65 वर्ष के उम्र के पड़ाव पर वे आज भी वे शिवाजी- द बॉस, रोबोट, कबाली जैसी हिट फिल्में देने का माद्दा रखते हैं| 65 वर्षीय रजनीकांत के लोग इतने दीवाने है कि कबाली फिल्म ने रिलीज़ होने से पहले ही 200 करोड़ रूपये कमा लिए | एक समय ऐसा भी था जब एक बेहतरीन अभिनेता होने के बावजूद उन्हें कई वर्षों तक नज़रंदाज़ किया जाता रहा पर उन्होंने अपनी हिम्मत नहीं हारी| ये बात रजनीकांत के आत्मविश्वास को और विपरीत परिस्तिथियों में भी हार न मानने वाले जज्बे का परिचय देती है|

जमीन से जुड़े हुए –

रजनीकांत आज इतने बड़े सुपर सितारे होने के बावजूद ज़मीन से जुड़े हुए हैं| वे फिल्मों के बाहर असल जिंदगी में एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही दिखते है| वे दूसरे सफल लोगों से विपरीत असल जिंदगी में धोती-कुर्ता पहनते है| शायद इसीलिए उनके प्रशंसक उन्हें प्यार ही नहीं करते बल्कि उनको पूजते हैं| रजनीकांत के बारे में ये बात जगजाहिर है कि उनके पास कोई भी व्यक्ति मदद मांगने आता है वे उसे खाली हाथ नहीं भेजते| रजनीकांत कितने प्रिय सितारे हैं, इस बात का पता इसी से लगाया जा सकता है कि दक्षिण में उनके नाम से उनके प्रशंशकों ने एक मंदिर बनाया है| इस तरह का प्यार और सत्कार शायद ही दुनिया के किसी सितारे को मिला हो| चुटुकलों की दुनिया में रजनीकांत को ऐसे व्यक्ति के रूप में जाना जाता है जिसके लिए नामुनकिन कुछ भी नहीं और रजनीकांत लगातार इस बात को सच साबित करते रहते है| आज वे 65 वर्ष की उम्र में रोबोट-2 फिल्म पर काम कर रहे है, उनका यही अंदाज लोगों के दिलों पर राज करता है|
सचिन तेंदुलकर की जीवनी सचिन तेंदुलकर का जीवन परिचय

सचिन तेंदुलकर की जीवनी सचिन तेंदुलकर का जीवन परिचय

सचिन तेंदुलकर की जीवनी सचिन तेंदुलकर का बचपन

सचिन तेंदुलकर की जीवनी


सचिन तेंदुलकर ने समय के साथ रनों का अम्बार लगा दिया है। उन्होंने 29 जून, 2007 को दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध बेलाफास्ट (आयरलैंड) में खेलते हुए एक दिवसीय मैचों में 15000 रन पूरे कर लिए। इतने रन बनाने के बाद सचिन। विश्व के ऐसे प्रथम खिलाड़ी बन गए, जिंन्होंने इतने बड़े आंकड़े को छुआ है। विश्व के श्रेष्ठतम बल्लेबाज माने जाने वाले आस्ट्रेलियाई बल्लेबाज डॉन ब्रैडमैन ने एक बार सचिन के बारे में कहा था- ”मैंने उसे टीवी पर खेलते हुए देखा और उसकी खेल तकनीक देखकर दंग रह गया।


सचिन तेंदुलकर के बारे में जानकारी

 तब मैंने अपनी पत्नी को अपने पास बुला कर उसे देखने को कहा। हालांकि मैंने स्वयं को खेलते हुए कभी नही देखा, लेकिन मुझे महसूस होता है कि यह खिलाड़ी ठीक वैसा ही खेलता है जैसा मैं खेलता था।” वास्तव में सचिन क्रिकेट का हीरो और एक ऐसा रोल मॉडल है जिसे सभी भारतीय पसन्द करते हैं। कल की सी बात लगती है जब सचिन तेंदुलकर क्रिकेट क्षेत्र में उतरा-एक घुंघराले बालों वाला 15 वर्षीय सचिन, जिसकी भर्राई सी आवाज ने लोगों के दिल में स्थान बना लिया।वह लगभग 15 वर्ष का ही था जब उसने 1988 में स्कूल के क्रिकेट मैच में काम्बली के साथ 664 रन बनाए थे। लोग उसके खेल का करिश्माई अंदाज़ देखते ही रह गए थे। इसके बाद उसका क्रिकेट के मैदान में अन्तरराष्ट्रीय मैचों में प्रदर्शन इतना अच्छा रहा है कि लोग कहते हैं कि वह वाकई लाजवाब है। 

सचिन तेंदुलकर ने 1989-90 में कराची में पाकिस्तान के विरुद्ध अपना पहला टैस्ट मैच खेल कर अपने क्रिकेट कैरियर की शुरुआत की थी। तब से अब तक के कैरियर में सचिन ने उन ऊंचाइयों को छू लिया है, जिसे छूना किसी अन्य क्रिकेट खिलाड़ी के लिए शायद ही सम्भव हो सके। आक्रामक बल्लेबाजी उसका अंदाज है। उसका बल्ला यूं घूमता है कि दर्शकों को अचम्भित कर देता है।


यदि वह जल्दी आउट भी हो जाता है तो भी अक्सर अपना करिश्मा दिखा ही जाता है। गेंदबाजी में भी वह अपना करिश्मा कभी-कभी दिखा देता है। एक दिवसीय मैचों में दस हजार से अधिक रन बनाने वाला वह पहला बल्लेबाज है। उसने सौ से अधिक विकेट लेने का करिश्मा भी दर्शकों को दिखाया है। सचिन ने दर्शकों के मानस पटल पर अपने खेल की अविस्मरणीय छाप छोड़ी है।


उसने 20 टैस्टों और एक दिवसीय मैचों में अनेकों शतक व हजारों रन बना डाले हैं जितने आज तक कोई नहीं बना सका है। जब सचिन केवल 11 वर्ष का था, तब वह बेहद शैतान था। मां-बाप को वह अपनी शैतानियों से परेशान करता रहता था। एक बार वह शैतानी करते हुए पेड़ से गिर गया।

 तब सचिन के बड़े भाई अजीत के दिमाग में विचार आया कि उसे क्रिकेट की कोचिंग क्लास के लिए भेज दिया जाए ताकि उसकी अतिरिक्त ऊर्जा खेलों में खर्च हो सके। कहा जा सकता है कि यह सचिन की अतिविशिष्ट जिन्दगी की शुरुआत थी। आज सचिन 100 टैस्ट मैच खेलने वाला विश्व का 17वां खिलाड़ी बन चुका है। सचिन ने 1989 में पाकिस्तान के विरुद्ध प्रथम अन्तरराष्ट्रीय मैच खेला था।

 तब सचिन केवल 16 वर्ष का था और प्रथम पारी में वह बहुत ही नर्वस व घबराया हुआ था। सचिन को तब यूं महसूस हुआ था कि शायद वह जिन्दगी में आगे अन्तरराष्ट्रीय मैच और नहीं खेल सकेगा। अकरम और वकार की तेज गेंदों के सामने वह केवल 15 रन ही बना सका था। लेकिन दूसरे टेस्ट में जब उसे खेलने का मौका मिला तब उसने 59 रन बना लिए और उसके भीतर आत्मविश्वास जाग उठा।

 सचिन देखने में सीधा-सादा इंसान है। वह अति प्रसिद्ध हो जाने पर भी नम्र स्वभाव का है। वह अपने अच्छे व्यवहार का श्रेय अपने पिता को देता है। उसका कहना है- ”मैं जो कुछ भी हूं अपने पिता के कारण हूँ। उन्होंने मुझ में सादगी और ईमानदारी के गुण भर दिए हैं। वह मराठी साहित्य के शिक्षक थे और हमेशा समझाते थे कि जिन्दगी को बहुत गम्भीरता से जीना चाहिए। जब उन्हें अहसास हुआ कि शिक्षा नहीं, क्रिकेट मेरे जीवन का हिस्सा बनने वाली है, उन्होंने उस बात का बुरा नहीं माना। 

सचिन तेंदुलकर का जीवन परिचय

उन्होंने मुझसे कहा कि ईमानदारी से खेलो और अपना स्तर अच्छे से अच्छा बनाए रखो। मेहनत से कभी मत घबराओ।” सचिन को भारतीय क्रिकेट टीम का कैप्टन बनाया गया था, परन्तु 2000 में उन्होंने मोहम्मद अजहरूद्‌दीन के आने के बाद वह पद छोड़ दिया।


सचिन, जिसे सुपर स्टार कहा जाता है, जीनियस कहा जाता है, जिसका एह-एक स्ट्रोक महत्त्वपूर्ण माना जाता है, अपने पुराने मित्रों को आज भी नहीं भूला है चाहे वह विनोद काम्बली हो या संजय मांजरेकर। जब मुम्बई की टीम में सचिन ने खेलना आरम्भ किया था तो संजय ने राष्ट्रीय टीम की ओर से खेला था। ये दोनों पुराने मित्र हैं। क्रिकेट के अतिरिक्त सचिन को संगीत सुनना और फिल्में देखना पसन्द है।
सचिन क्रिकेट को अपनी जिन्दगी और अपना खून मानते हैं। क्रिकेट के कारण प्रसिद्धि पा जाने पर वह किस चीज का आनन्द नहीं ले पाते-यह पूछने पर वह कहते हैं कि दोस्तों के साथ टेनिस की गेंद से क्रिकेट खेलना याद आता है। 29 वर्ष और 134 दिन की उम्र में सचिन ने अपना 100वां टैस्ट इंग्लैण्ड के खिलाफ खेला। 5 सितम्बर, 2002 को ओवल में खेले गए इस मैच से सचिन 100वां टैस्ट खेलने वाला सबसे कम उम्र का खिलाड़ी बन गया। सचिन के क्रिकेट खेल की औपचारिक शुरुआत तभी हो गई जब 12 वर्ष की उम्र में क्लब क्रिकेट (कांगा लीग) के लिए उसने खेला। सचिन बड़ी-बड़ी कम्पनियों का ब्रांड एम्बेसडर बना है।


 एम. आर. एफ. टायर, पेप्सी, एडिडास, वीजा मास्टर कार्ड, फिएट पैलियो जैसी नामी कम्पनियों ने उसे अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाया। बड़ी कम्पनियों में विज्ञापन के लिए उसकी सबसे ज्यादा मांग है। 1995 में सचिन ने 70 लाख पचास हजार (7.5 मिलियन) डालर का वर्ल्ड टेल कम्पनी के साथ 5 वर्षीय अनुबंध किया। इससे सचिन विश्व का सबसे धनी क्रिकेट खिलाड़ी बन गया। इसके पूर्व ब्रायनलारा ने ब्रिटेन की कम्पनी के साथ सर्वाधिक 10 लाख 20 हजार डॉलर का अनुबंध किया था। सचिन ने 2002 में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया।



अन्तरराष्ट्रीय मैचों में 20000 रन बनाने वाला वह एकमात्र खिलाड़ी बन गया है। उसने 102 टेस्ट मैचों में खेली गई 162 पारी में 8461 रन बनाने के अतिरिक्त 300 एक दिवसीय मैचों में 11544 रन बनाने का रिकार्ड स्थापित किया है। उसके बारे में कहा जाता है वह विवियन रिचर्ड, मार्क वा, ब्रायन लारा सब को मिलाकर एक है। तेंदुलकर मानो एक आदमी की सेना है। वह शतक बनाता है, उसे गेंद दे दो, वह विकेट ले लेता है, वह टीम के अच्छे फील्डरों में से एक है। हम भाग्यशाली हैं कि वह भारतीय हैं। 


25 मई, 1995 को सचिन ने डाक्टर अंजलि मेहता से विवाह कर लिया। उनके दो बच्चे हैं। बड़ी बच्ची का नाम ‘सराह’ है जिसका अर्थ है कीमती। छोटा बच्चा बेटा है। सचिन की अंजलि से 1990 में मुलाकात हुई। सचिन ने एक बार इंटरव्यू में कहा था- ”मुझे उससे प्यार इसलिए हो गया क्योंकि उसके गाल गुलाबी हो उठते हैं।” सचिन का पूरा नाम सचिन रमेश तेंदुलकर है। उसका नाम उसके माता-पिता ने अपने पंसदीदा संगीत निर्देशक सचिन देव बर्मन के नाम पर रखा। सचिन ने अपना पहला साक्षात्कार दादर के एक ईरानी रेस्टोरेंट में अपने बड़े भाई से दिलवाया था क्योंकि तब उसमें अधिक आत्मविश्वास नहीं था। 


सचिन को बचपन में क्रिकेट से कोई विशेष लगाव न था। क्रिकेट में शामिल होने पर वह तेज गेंदबाज बनना चाहता था, इसलिए डेनिस लिली से प्रशिक्षण के लिए एम. आर. एफ. पेस एकेडमी में गया। तब उसे बताया गया कि उसे बल्लेबाजी पर ध्यान लगाना चाहिए। सचिन को अपनी मां के हाथ का भोजन बहुत पसन्द है विशेषकर सी-फूड। इस कारण उसके आने पर वह विशेष रूप से मछली मंगवाती है।

सचिन के बारे में कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य -सचिन तेंदुलकर का जीवन परिचय




मात्र बारह वर्ष की उम्र में सचिन ने क्लब क्रिक्रेट (कांगा लीग) मे खेलना शुरू किया।
बाम्बे स्कूल क्रिकेट टूर्नामेट में अपना पहला शतक 1936 में बनाया। फिर अगले वर्ष स्कूल क्रिकेट में 1200 रन बनाए जिनमें दो तिहरे शतक भी शामिल थे।


1988-89 में सचिन ने रणजी ट्राफी में बम्बई की तरफ से खेला और शतक बनाया। वह बम्बई की तरफ से खेलने वाला अब तक का सबसे कम उम्र का खिलाड़ी था। अगले वर्ष वह ईरानी ट्राफी के लिए टीम में शामिल हुआ और 103 रन बनाए। उसके पश्चात् दलीप ट्राफी में शामिल होने पर पश्चिमी जोन की ओर पूर्वी जोन के विरुद्ध 151 रन बनाए। इस प्रकार तीनों देशीय टूर्नामेंट में प्रथम बार भाग लेने पर शतक लगाने वाला प्रथम भारतीय खिलाड़ी बन गया।


जब सचिन और विनोद काम्बली ने मिल कर सेट जेवियर्स के विरुद्ध शारदाश्रम के 664 रन बनाए तब किसी भी क्रिकेट खेल के लिए यह विश्व रिकार्ड बन गया। इसमें सचिन ने 326 नाट आउट का स्कोर बनाया। फिर बाम्बे क्रिकेट की ओर से उसे वर्ष का सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट खिलाड़ी घोषित किया गया।


  • 1991 में 18 वर्ष की आयु में सचिन यार्कशायर का प्रतिनिधित्व करने वाला प्रथम खिलाड़ी बना। उस वर्ष उसे ‘वर्ष का क्रिकेटर’ चुना गया।


  • 1992 में वह पहला खिलाड़ी बना जिसे तीसरे अम्पायर द्वारा आउट करार दिया गया।


  • सचिन ने अपने खेल की शुरुआत से लगातार हर टैस्ट मैच खेला और लगातार 84 टैस्ट खेले।

  • सचिन 29 वर्ष 134 दिन की आयु में 100वां टैस्ट मैच खेलने वाला सबसे कम आयु का खिलाड़ी बना।

  • सचिन का पहला टैस्ट 1989 में कराची में हुआ जो कपिल का 100 वां टैस्ट मैच था।

  • जिन खिलाड़ियों ने 100 या अधिक टैस्ट मैच खेले हैं, उनमें सचिन का औसत सर्वाधिक है यानी 57।99। जब कि उसके बाद मियादाद का 57।57 है और गावस्कर का (51।12)।

  • ‘राजीव गाधी खेल रत्न’ पुरस्कार पाने वाला वर्ष 2006 तक सचिन एकमात्र क्रिकेटर हैं।

  • 1992 में 19 वर्ष की आयु में टैस्ट मैच में 1000 रन बनाने वाला सचिन विश्व का सबसे कम उम्र का खिलाड़ी है।

  • 20 वर्ष की आयु से पूर्व टैस्ट मैच में 5 शतक बनाने वाला सचिन प्रथम व एकमात्र खिलाड़ी है।

  • सचिन ने अपना पहला टैस्ट शतक इंग्लैंड के विरुद्ध बनाया। तब उसने 119 रन बनाए और नॉट आउट रहा। पाकिस्तान के मुश्ताक मोहम्मद के बाद सचिन सबसे कम आयु का दूसरा खिलाड़ी है।

  • अक्टूबर 2002 में सचिन 20000 रन बना कर अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट में इतने रन बनाने वाला विश्व का प्रथम बल्लेबाज बन गया।

  • जुलाई, 2002 में ‘विजडन’ (लन्दन) द्वारा सचिन को ‘पीपुल्स च्वाइस’ अवार्ड दिया गया।

  • सचिन दुनियां का सफलतम बल्लेबाज है। 10 दिसम्बर, 2005 को सचिन 38 शतकों के साथ वन डे में सर्वाधिक 13909 रन बनाने वाला खिलाड़ी बना।

  • अगस्त 2004 तक सचिन ने 69 अर्द्धशतक बनाकर पाकिस्तान के कप्तान इंजमाम उल-हक के एक दिवसीय मैचों में सर्वाधिक अर्द्धशतक की बराबरी कर ली। सचिन ने 339 मैचों में 69 अर्द्धशतक लगाए। जबकि इंजमाम ने 317 मैचों में 69 अर्धशतकशतक बनाए।

  • सचिन 38 शतक बनाकर विश्व रिकार्ड बना चुका है।

  • सचिन ने 339 मैचों में 13415 रन बना लिए और विश्व में एक दिवसीय मैचों में सर्वाधिक रन बनाने वाले खिलाड़ी बने, तब तक इजंमाम 317 मैचों में 9897 रन बनाकर रन बनाने के मामले में दूसरे नम्बर पर थे।

  • सचिन से पूर्व अजहरुद्दीन ने सर्वाधिक 334 एक दिवसीय मैच खेले थे। सचिन ने अगस्त 2004 तक 339 मैच खेल कर अजहरुद्दीन के रिकार्ड को पीछे छोड़ दिया और भारत का सर्वाधिक मैच खेलने वाला खिलाड़ी बन गया।

  • 339 मैच खेलने के बाद भी सचिन विश्व में दूसरे नम्बर का खिलाड़ी है। विश्व का सर्वाधिक एक दिवसीय मैच खेलने वाला खिलाड़ी पाकिस्तान का पूर्व कप्तान वसीम अकरम है जिसने 356 मैच खेले।

  • 50 बार वह ‘मैन ऑफ द मैच’ का पुरस्कार जीत चुका है। यह एक रिकार्ड है।

  • 10 दिसम्बर 2005 को सचिन ने दिल्ली के फिरोजशाह कोटल मैदान पर टैस्ट मैचों में सर्वाधिक शतक (34 शतक) बनाने का सुनील गावस्कर का रिकार्ड तोड़ दिया और अपना 35वां शतक श्रीलंका के खिलाफ बनाया। इस टेस्ट मैच में उसने गावस्कर के 125 टैस्ट खेलने के रिकार्ड की भी बराबरी की।

  • टेस्ट मैच में दस हजार से अधिक रन बनाने वाले सचिन सबसे युवा खिलाड़ी हैं।

  • विज्ञापनों की दुनिया का उन्हें बादशाह कहा जाता है। सारे रिकार्ड तोड़ते हुए 2006 में उन्होंने आइकोनिक्स से 6 वर्ष के लिए 180 करोड़ का अनुबंध किया। इससे पूर्व उन्होंने वर्ल्ड टेल के साथ 5 वर्ष का 100 करोड़ का अनुबंध किया था।

  • वह वन डे में सर्वाधिक 13909 रन (दिसम्बर-2005 तक) बना चुके थे।

  • हीरो होंडा स्पोर्ट्स अकादमी ने वर्ष 2004 के लिए सचिनतेंदुलकर को क्रिकेट का श्रेष्ठतम खिलाड़ी नामांकित किया

  • मई 2006 तक सचिन 132 टैस्ट मैचों में 19469 रन और 362 वन डे मैचों में 14146 रन बना चुके थे।

  • सचिन को अक्सर क्रिकेट का भगवान कहा जाता है। सचिन से यह पूछे जाने पर कि उन्हें यह सुनकर कैसा लगता है, उनका कहना था- ”मैं देवता नहीं हूं। लेकिन खुशी मिलती है जब मेरे देश के लोग मुझ पर इतना भरोसा जताते हैं। मैं देश के भाई-बहनों के चेहरे पर मुस्कान ला सकूं इससे बड़ी बात क्या होगी भगवान ने यह वरदान दिया है।

  • 35वां शतक बनाने पर सचिन ने कहा- ”वैसे तो सभी शतक महत्त्वपूर्ण रहे हैं। मैने पहला शतक 17 वर्ष की उम्र में इंग्लैंड के खिलाफ ओल्ड ट्रेफर्ड में जमाया था। पहला होने के कारण वह भी यादगार है और यह 35वां शतक भी सबसे यादगार रहेगा।” सचिन को भगवान में पूरा विश्वास है। साईं बाबा और गणपति के वह अनन्य भक्त हैं।
धीरूभाई अंबानी की जीवनी

धीरूभाई अंबानी की जीवनी

धीरूभाई अंबानी की जीवनी धीरूभाई अंबानी स्टोरी

धीरूभाई अंबानी की जीवनी


एक आदमी जो हाईस्कूल की शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाया। वह इतने गरीब परिवार से था कि खर्चा चलाने के लिए उसे अपनी किशोरावस्था से ही नाश्ते की रेहड़ी लगाने से लेकर पेट्रोल पंप पर तेल भरने तक का काम करना पड़ा। ऐसे लड़के ने जब एक वृद्ध के तौर पर दुनिया को अलविदा कहा तो उसकी सम्पति का मूल्य 62 हजार करोड़ रूपये से भी ज्यादा था। अगर आप अब भी इस शख्सशियत को नहीं पहचान पाएं तो हम बात कर रहे हैं, धीरूभाई अंबानी की। एक ऐसा सफल चेहरा जिसने हरेक गरीब को उम्मीद दी कि सफल होने के लिए पैसा नहीं नियत चाहिए। सफलता उन्हीं को मिलती है जो उसके लिए जोखिम उठाते हैं। धीरूभाई ने बार — बार साबित किया कि जोखिम लेना व्यवसाय का नहीं आगे बढ़ने का मंत्र है।

धीरूभाई अंबानी का जीवन परिचयशुरूआती जीवन –dhiru bhai ambani biography in hindi



28 दिसम्बर, 1932 को गुजरात के जूनागढ़ के छोटे से गांव चोरवाड़ में धीरजलाल हीरालाल अंबानी का जन्म हुआ। पिता गोर्धनभाई अंबानी एक शिक्षक थे। माता जमनाबेन एक सामान्य गृहिणी थी। धीरूभाई के चार भाई—बहन और थे। इतने बड़े परिवार का लालन—पालन करना अध्यापक गोर्धनभाई के लिए सरल काम न था। एक समय ऐसा आया कि आर्थिक परेशानियों केी वजह से धीरू भाई को पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी और उनकी स्कूली शिक्षा भी अधूरी रह गई। पिता की मदद करने के लिए धीरूभाई ने छोटे—मोटे काम करने शुरू कर दिए।


धीरूभाई व्यवसायिक सफर की शुरूआत –



यह उदाहरण कि हरेक सफलता के पीछे ढेरों असफलताएं छुपी हुई होती है, धीरूभाई अंबानी पर एकदम सटीक खरी उतरती हैं। पढ़ाई छोड़ने के बाद पहले पहल धीरूभाई ने फल और नाश्ता बेचने का काम शुरू किया, लेकिन कुछ खास फायदा नहीं हुआ। उन्होंने दिमाग लगाया और गांव के नजदीक स्थित धार्मिक पर्यटन स्थल गिरनार में पकोड़े बेचने का काम शुरू कर दिया। यह काम पूरी तरह आने वाले पर्यटकों पर निर्भर था, जो साल के कुछ समय तो अच्छा चलता था बाकि समय इसमें कोई खास लाभ नहीं था। धीरूभाई ने इस काम को भी कुछ समय बाद बंद कर दिया। बिजनेस में मिली पहली दो असफलताओं के बाद उनके पिता ने उन्हें नौकरी करने की सलाह दी।

धीरूभाई नौकरी के दौरान भी बिजनेस –





धीरूभाई के बड़े भाई रमणीक भाई उन दिनों यमन में नौकरी किया करते थे। उनकी मदद से धीरूभाई को भी यमन जाने का मौका मिला। वहां उन्होंने शेल कंपनी के पेट्रोल पंप पर नौकरी की शुरूआत की और महज दो साल में ही अपनी योग्यता की वजह से प्रबंधक के पद तक पहुंच गए। इस नौकरी के दौरान भी उनका मन इसमें कम और व्यवसाय करने के मौको की तरफ ज्यादा रहा।उन्होंने उस हरेक संभावना पर इस समय में विचार किया कि किस तरह वे सफल बिजनेस मैन बन सकते हैं। दो छोटी घटनाएं बिजनेस के प्रति उनके जूनून को बयां करती हैं। यह दोनों घटनाएं उस समय की है जब वे शेल कंपनी में अपनी सेवाएं दे रहे थे। जहां वे काम करते थे, वहां काम करने वाला कर्मियों को चाय महज 25 पैसे में मिलती थी, लेकिन धीरूभाई पास ही एक बड़े होटल में चाय पीने जाते थे, जहां चाय के लिए 1 रूपया चुकाना पड़ता था।


उनसे जब इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उसे बड़े होटल में बड़े—बड़े व्यापारी आते हैं और बिजनेस के बारे में बाते करते हैं। उन्हें ही सुनने जाता हूं ताकि व्यापार की बारीकियों को समझ सकूं। धीरूभाई ने अपने ही तरीके से बिजनेस मैनेजमेंट की शिक्षा ली। 


जिन्होंने आगे चलकर व्हाटर्न और हावर्ड से पारम्पिरक तरीके से डिग्री लेने वाले को नौकरी पर रखा। इसी तरह दूसरी घटना उनकी पारखी नजर और अवसर भुनाने की क्षमता की ओर इशारा करती है। हुआ यूं कि उन दिनों में यमन मे चांदी के सिक्कों का प्रचलन था। धीरूभाई को एहसास हुआ कि इन सिक्कों की चांदी का मूल्य सिक्कों के मूल्य से ज्यादा है और उन्होंने लंदन की एक कंपनी को इन सिक्कों को गलाकर आपूर्ति करनी शुरू कर दी। 


यमन की सरकार को जब तक इस बात का पता चलता वे मोटा मुनाफा कमा चुके थे। ये दोनों घटनाएं इशारा कर रही थी कि धीरूभाई अंबानी के पास एक सफल बिजनेसमैन बनने के सारे गुण हैं।


धीरूभाई चुनौतियां और सफलता –





यमन में धीरूभाई का समय बीत रहा था कि वहां आजादी के लिए लड़ाई शुरू हो गई और ढेरों भारतीयों को यमन छोड़ना पड़ा। इस परेशानी के आलम में धीरूभाई को भी यमन छोड़ना पड़ा।


 ईश्वर ने एक सफल बिजनेसमैन बनाने के लिए परिस्थितियां गढ़नी शुरू कर दी। इस नौकरी के चले जाने के बाद उन्होंने नौकरी की जगह बिजनेस करने का निर्णय लिया, लेकिन व्यवसाय शुरू करने के लिए पैसों की जरूरत थी। धीरूभाई के पास निवेश के लिए बड़ी रकम नहीं थी इसलिए उन्होंने अपने मामा त्रयम्बकलाल दामाणी के साथ मसालों और शक्कर के व्यापार की शुरूआत की।


 यहीं पर रिलायंस कमर्शियल कॉरर्पोरेशन की नींव पड़ी। इसके बाद रिलायंस ने सूत के कारोबार में प्रवेश किया। यहां भी सफलता ने धीरूभाई के कदम चूमे और जल्दी ही वे बॉम्बे सूत व्यपारी संघ के कर्ता—धर्ता बन गए। यह बिजनेस जोखिमों से भरा हुआ था और उनके मामा को जोखिम पसंद नहीं था इसलिए जल्दी ही दोनों के रास्ते अलग हो गए। 


इससे रिलायंस पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा और 1966 में रिलायंस टैक्सटाइल्स अस्तित्व में आया। इसी साल रिलायंस ने अहमदाबाद के नरोदा में टेक्सटाइल मिल की स्थापना की। विमल की ब्रांडिंग इस तरह की गई कि जल्दी ही यह घर—घर में पहचाना जाने लगा और विमल का कपड़ा बड़ा भारतीय नाम बन गया। विमल दरअसल उनके बड़े भाई रमणीक लाल के बेटे का नाम था।


इन्हीं सब संघर्षों के बीच उनका विवाह कोकिलाबेन से हुआ जिनसे उन्हें दो बेटे मुकेश और अनिल तथा दो बेटियां दीप्ती और नीना हुईं। उन्होंने इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और रिलायंस कपड़े के साथ ही पेट्रोलियम और दूरसंचार जैसी कंपनियों के साथ भारत की सबसे बड़ी कंपनी बन गई। 


इन सबके बीच धीरूभाई अंबानी पर सरकार की नीतियों को प्रभावित करने और नीतियों की कमियों से लाभ कमाने के आरोप भी लगते रहे। उनके और नुस्ली वाडिया के बीच होने वाले बिजनेस घमासान पर भी बहुत कुछ लिखा गया। उनके जीवन से प्रेरित एक फिल्म गुरू बनाई गई जिसमें अभिषेक बच्चन ने उनकी भूमिका का निर्वाह किया। लगातार बढ़ते बिजनेस के बीच उनका स्वास्थ्य खराब हुआ और 6 जुलाई 2002 को उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के बाद उनके काम को बड़े बेटे मुकेश अंबानी ने संभाला।
मेजर ध्यान चंद की कहानी

मेजर ध्यान चंद की कहानी

मेजर ध्यान चंद की कहानी major dhyan chand biography in hindi

मेजर ध्यान चंद की कहानी major dhyan chand biography in hindi



हॉकी के जादूगर के नाम से प्रसिद्ध मेजर ध्यान चंद बहु प्रतिष्ठित बेहतरीन हॉकी प्लेयर थे। गोल करने की उनके क्षमता अद्भुत थी और अक्सर विरोधी टीम भारत के इस खिलाडी के सामने घुटने टेकते हुए नजर आते थे।

 29 अगस्त को आने वाला उनका जन्मदिन भारत में राष्ट्रिय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है और भारत के राष्ट्रपति ने भी उन्होंने राजीव गाँधी खेल रत्न, अर्जुन और द्रोणाचार्य अवार्ड से इस दिन सम्मानित भी किया गया है। हॉकी फील्ड में तीन ओलिंपिक मैडल जीतने वाला, भारतीय हॉकी खिलाडी ध्यान चंद बेशक हॉकी के सबसे बेहतरीन और हराफनौला खिलाडी थे। वे उस समय भारतीय अंतरराष्ट्रीय हॉकी टीम के सदस्य थे, जिस समय भारतीय हॉकी टीम ने पूरी दुनिया में अपना दबदबा बनाया हुआ था।



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एक खिलाडी के रूप में गोल करने की उनकी शैली और कला दुसरे सभी खिलाडियों से बिल्कुल अलग और अद्भुत थी। इसीलिए उन्हें “हॉकी के जादूगर” के नाम से भी जाना जाता है। हर मैच में हॉकी की गेंद पर उनकी अद्भुत पकड़ होती थी और गेंद को घसीटने में भी वे बेहतर थे। बल्कि गेंद को घसीटने की उनकी कला अविश्वसनीय थी। 

लोग उन्हें हॉकी की स्टिक से खेलने वाला जादूगर कहकर ही बुलाते थे। कई बार विरोधी टीम ने उनकी स्टिक को भीतर से देखने के लिए मैच के दौरान तोड़ने की भी कोशिश की थी। हॉकी के प्रति उनका प्रेम तब बढ़ने लगा था जब किशोरावस्था में ही वे आर्मी में शामिल हो चुके थे। शुरू-शुरू में आर्मी टीम की तरफ से खेलते थे, जहाँ उन्होंने अच्छा खेलकर अपना नाम भी कमाया।


जिस भारतीय टीम ने 1928 के एम्स्टर्डम ओलिंपिक और 1932 के लोंस एंजेल्स ओलिंपिक में गोल्ड मैडल जीता था, उस भारतीय टीम के कप्तान ध्यान चंद ही थे। 1932 के ओलिंपिक में भारत का पहला मैच जापान के खिलाफ था, जिसे उन्होंने 11-1 से जीता था। इससे सिद्ध हुआ की भारतीय टीम काफी अच्छा प्रदर्शन कर रही है और सबको यकीन था की टीम फाइनल में जाकर एक बार फिर गोल्ड मैडल जरुर जीतेंगी। 




ओलिंपिक के बाद भारतीय टीम ने यूनाइटेड स्टेट, इंग्लैंड और दुसरे देशो से खेलने के लिए बहुत से इंटरनेशनल टूर भी किये। टूर के अंत में, भारत खेले गये 37 मैचों में से 34 जीता था। इस टूर में चंद ने भारत द्वारा किये गये 338 गोल में से 133 गोल दागे थे। 1934 में उन्हें भारतीय हॉकी टीम का कप्तान बनाया गया और अपने अपनी कप्तानी में टीम को 1936 के बर्लिन ओलिंपिक में ले गये। वहा भी उन्होंने अपना जादू दिखाया और भारत को तीसरा ओलिंपिक गोल्ड मैडल जीताया। 1940 के अंत तक वे लगातार हॉकी खेलते रहे और फिर इसके बाद 1956 में आर्मी के मेजर के रूप में सेवानिर्वृत्त हुए। सेवानिर्वृत्त होने के बाद वे भारतीय टीम के कोच बने।


अंतिम दिन -


1956 में, 51 साल की उम्र में मेजर के पद पर कार्य करते हुए वे सेवानिर्वृत्त हुए। इसके बाद उसी साल भारत सरकार ने उन्हें भारत के तीसरे सर्वोच्च सम्मान पद्म भूषण देकर सम्मानित किया। सेवानिर्वृत्ति के बाद वे राजस्थान के माउंट अबू में कोच का काम करने लगे। 

बाद में उन्होंने पटियाला के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्पोर्ट के मुख्य हॉकी कोच होने के पद को स्वीकार किया और कई सालो तक उसी पद रहते हुए काम भी किया। चंद ने अपने अंतिम दिन अपने गाँव झाँसी, उत्तर प्रदेश, भारत में बिताए थे। मेजर ध्यान चंद की मृत्यु 3 दिसम्बर 1979 को ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस, दिल्ली में हुई। झाँसी के शहीदों के मैदान पर उनका दाह संस्कार किया गया था।

मेजर ध्यान चंद को मिले हुए अवार्ड और उपलब्धियाँ –



• वे उन तीनो भारतीय टीम के सदस्य थे जिन्होंने 1928, 1932 और 1936 के ओलिंपिक में गोल्ड मैडल जीता था। अपने पुरे हॉकी करियर में उन्होंने तक़रीबन 1000 से भी ज्यादा गोल किये थे, जिनमे से 400 उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किये थे।


• 1956 में हॉकी फील्ड में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें भारत के तीसरे सर्वोच्च अवार्ड पद्म भूषण से सम्मानित किया था।


किसी भी खिलाडी की महानता को गिनने का सबसे का पैमाना यही है की उस खिलाडी के साथ कितनी घटनाये जुडी हुई है। उस हिसाब से तो मेजर ध्यान चंद का कोई जवाब ही नही। हौलेंड में तो लोगो ने उनकी हॉकी स्टिक तुडवा कर भी देख ली थी के कही उसमे चुम्बक तो नही। यही घटना हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी लोकप्रियता को दर्शाती है। 

वक्त अगर किसी चीज को लौटाना चाहे तो बेशक भारतीय खेल जगत मेजर ध्यानचंद को मांगना चाहेगा। उनसा न कोई हुआ और हो सकता है और ना भविष्य में कोई होंगा। खेल से खिलाड़ी की पहचान बनती है लेकिन ध्यानचंद तो हॉकी का आइना बन गए।